हार्ड फक इन ट्रेन का मजा मैंने अपनी जवान गर्लफ्रेंड के साथ लिया. हम कूपे में पूरी रात नंगे रहे और चुदाई की, गांड भी मारी. सुबह सुबह हम दोनों फिर शुरू हो गए.
दोस्तो, मैं आयुष बिंदल आप सभी का अपनी सेक्स कहानी के इस भाग में पुनः स्वागत करता हूँ.
कहानी के तीसरे भाग
ट्रेन के कूपे में सैटिंग की गांड मारी
में अब तक आपने पढ़ा था कि मेरी और मानसी की चुदाई के बाद हम दोनों गांड चुदाई के बाद शिथिल अवस्था में पड़े थे.
अब आगे हार्ड फक इन ट्रेन का मजा:
कोई 15 मिनट के बाद मैं उठा और रेलवे द्वारा दी हुई नैपकिन को थोड़ा सा गीला करके मानसी की चूत को धीरे धीरे साफ़ करने लगा.
मुझे चूत साफ़ करता देख वह सीधी होकर लेट गई और मेरा सहयोग करती हुई अपनी कमर को थोड़ा ऊपर उठा लिया.
इसी सुविधा के चलते मैंने नीचे पीछे सब जगह आराम से साफ़ कर दिया.
तक़रीबन बीस मिनट के बाद जब उसे थोड़ा अच्छा लगा, तब वह मेरे सीने से चिपक गई.
वह धीरे से बोली- इतना आनन्द इतना मजा मुझे सेक्स में आज तक न कभी आया और न ही आने की उम्मीद है!
मैंने उसके माथे को चूमते हुए कहा- जान, तुम बस ऐसे ही जिंदगी भर मेरा साथ दो, फिर देखना सारी जिंदगी तुम्हें ऐसा ही मजा आएगा … और हो सका तो इससे भी ज्यादा!
मैंने वक़्त देखा तो सुबह के चार बज रहे थे.
इतनी देर तक चुदाई के कारण हम दोनों को भूख लग रही थी, तो हमने बचा हुआ खाना खाया और वाशरूम जाकर फ्रेश हुए.
फिर बिस्तर को अच्छे से साफ़ करके लाइट बंद कर दी और एक दूसरे की बांहों में जोर से चिपक कर नींद के आगोश में चले गए.
सुबह आठ बजे मेरी नींद खुली तो देखा मानसी आराम से सो रही है और ट्रेन किसी स्टेशन पर रुकी हुई थी.
मेरा लंड भी जगा हुए था तो मैंने थोड़ा थूक लगा कर उसे हल्का सा चिकना किया और मानसी जो मेरी तरफ पीठ करके सो रही थी, उसकी एक टांग को आराम से थोड़ा उठाया और बिल्कुल आहिस्ता से धीरे धीरे उसकी चूत में दबाव बना कर डालने लगा.
कुछ देर की मेहनत के बाद मेरा लंड अपनी मंजिल पर पहुंच चुका था.
पर मैंने धक्के देना शुरू नहीं किया.
दरअसल मैं अभी चुदाई करना ही नहीं चाहता था सिर्फ लंड को अन्दर डालकर सोना चाहता था.
इसमें सबसे अच्छी बात ये हुई की मानसी की नींद नहीं खुली.
शुरू में वह जरा सा कुनमुनाई जरूर थी, पर फिर से सो गई … शायद उसे थकान ज्यादा हो गई होगी.
खैर … उसके बाद मैं भी उससे चिपक कर सो गया.
अब जैसे जैसे ट्रेन के झटके लगते वैसे ही मेरा लंड भी हल्का हल्का झटका मारना शुरू कर देता, पर मैं अपनी तरफ से कोई कोशिश नहीं कर रहा था.
थोड़ी देर बाद मुझे भी नींद आ गई.
उसके बाद लगभग साढ़े दस बजे मानसी की नींद खुली तो उसे महसूस हुआ कि उसके अन्दर मेरा लंड घुसा हुआ है.
उसने लंड अच्छे से सैट किया और हल्के हल्के धक्के लगाना शुरू कर दिए क्योंकि उसकी चूत अभी सूखी हुई थी इस वजह से हल्का हल्का सा खिंचाव दोनों को महसूस हो रहा था.
चुदाई की वजह से मेरी भी नींद खुल गई.
जब मैंने देखा कि मानसी खुद ही मेहनत कर रही है तो मैंने उसे दबोचा और उसकी गर्दन को चूमते हुए चुदाई शुरू कर दी.
मानसी ने अपनी गर्दन को थोड़ा सा मोड़ते हुए मेरे होंठों को अपने लबों में भर लिया और चूमना शुरू कर दिया.
सुबह बिना ब्रश किए हम दोनों के मुँह से हल्की हल्की बदबू आ तो रही थी, पर चुदाई के वक़्त ये सब बात कोई ध्यान नहीं रखता.
अब मैंने उसकी एक टांग को अपने हाथ से उठा कर जोर से झटके मारने शुरू कर दिए थे.
इस पर मानसी ने मुझे रोका और मेरे ऊपर चढ़ कर बैठ गई.
अब की बार उसका मुँह मेरे सामने नहीं था … यानि मैं नीचे लेटा हुआ था और उसकी पीठ मेरी तरफ थी.
उसने लंड को अच्छे से सैट किया और आराम से उछलने लगी.
मैंने उसकी कमर को चूतड़ों के पास से पकड़ा और मानसी को उछालने में मदद करने लगा.
थोड़ी देर इसी हालत में चुदाई करने के बाद मानसी सामने की तरफ झुक कर पूरी लेट गई.
अब वह सिर्फ अपनी गांड को उछाल कर चुदाई का आनन्द लेने लगी थी.
उसके मुँह के पास मेरे पैर थे, तो वह चुदाई करते वक़्त मेरे तलवे में गुदगुदी करने लगी और खिलखिला कर हंसने भी लगी.
मेरे दोनों पैर मानसी के नीचे दबे हुए थे, जिस वजह से मैं उन्हें हटा भी नहीं सकता था.
मैं सीधा उठ कर बैठ गया और मानसी को भी उठा कर वैसे ही बैठा दिया.
उसकी पीठ मेरे सीने से चिपक गई.
अभी भी मानसी ही उछाल कर खुद चुद रही थी और मैं दोनों हाथों से उसके कबतूर मसल रहा था.
मानसी ने अपनी गर्दन पीछे घुमा रखी थी, जिससे हमारे होंठ भी आपस में भिड़े हुए थे.
काफी देर तक चुदाई काने के बाद और लगातार उछलने के कारन मानसी थकने लगी और इसी के साथ उसका रस भी बह निकला था.
उसकी चूत का हम दोनों की जांघों पर बहने लगा था.
कुछ देर अपनी सांसों को काबू में करने के बाद मानसी खड़ी हुई और एक जोरदार चुम्बन लेकर अपने कपड़े पहनने लगी.
मैंने पूछा तो बोली- सुबह सो कर उठे हैं, फ्रेश तो हो लेने दो!
मैंने कहा- ठीक है पहले तुम चली जाओ.
वह कपड़े सही से पहनने लगी.
मैंने ट्रेन की लोकेशन चेक की तो पांच मिनट बाद किसी स्टेशन पर 15 मिनट के लिए रुकने वाली थी.
मैंने कहा- पहले नीचे चल कर कुछ नाश्ता ले आते हैं.
वह बोली- ठीक है.
फिर हम दोनों कपड़े पहन कर कूपे को लॉक करके नीचे जाकर सैंडविच पराठा कॉफ़ी और भी कुछ कुछ लेकर आ गए.
वापस आकर हम कूपे में सामान रखने जा रहे थे, इतने में बाजू के कूपे वाली लड़की सामने दिख गई.
शायद वह बाथरूम जा रही थी.
हमें देख कर बोली- रात को बहुत हल्ला कर रहे थे आप लोग! आप लोगों की वजह से मुझे भी कपड़े उतार कर सोना पड़ा.
ये सुन कर हम दोनों शर्मा गए.
मैंने कहा- प्राइवेट कूपे है बॉयफ्रेंड को भी साथ ले आती तो तुम्हारी आवाज़ भी हमें सुनाई देती!
ये सुन कर हम तीनों ही हंस पड़े.
और मानसी मुझे खींचती हुई कूपे के अन्दर ले आई क्योंकि वह लड़की और ज्यादा बात करके चिपकने की कोशिश में लगी हुई थी.
जैसे ही हम कूपे में पहुंचे ट्रेन भी चल पड़ी.
मानसी बोली- पहले मैं फ्रेश होने जा रही हूँ.
वह चली गई और बीस मिनट बाद वापस आई.
तब तक मैंने अपने घर वालों से बात कर ली थी ताकि बाद में कोई डिस्टर्ब ना करे.
फिर मानसी आई तो मैंने उससे कहा- तुम भी दीपेश और घर वालों से बात कर लो ताकि बार बार कोई कॉल न करे.
उसने भी हां भरी और फ़ोन पर बात करने लगी.
मैं बाथरूम चला गया और वहां अच्छे से फ्रेश होकर मुँह हाथ अच्छे से साफ़ करके वापस आया.
अब तक तीस मिनट बीत चुके थे.
मैंने कूपे के अन्दर आकर देखा तो मानसी ने पूरा खाना सजा रखा था.
मैं अन्दर आया और प्यार से उसके गुलाबी गाल पर प्यार भरा किस किया.
बदले में मानसी ने भी मेरे होंठों को प्यार से चूमा और हम आराम से बैठ कर नाश्ता करते हुए बातें करने लगे.
हम दोनों को ऐसा लग रहा था कि ये सफर कभी खत्म ही न हो और हम दोनों हमेशा एक साथ ही रहें.
पर दोनों की मजबूरियां भी थीं, इसलिए जैसा चल रहा है हमें वैसे ही चलना पड़ेगा.
इसी तरह आराम से कहते बात करते हुए दोपहर के बारह बज गए.
सब साफ़ करके मैंने ट्रेन का स्टेटस देखा ताकि पता चल सके कि हमें कब उतरना है.
पता चला कि ट्रेन दो घंटे देरी से चल रही है.
उसके बाद हम दोनों नीचे चिपक कर लेट गए हालांकि हमने कपड़े पहने हुए थे, पर कपड़ों के अन्दर कुछ भी नहीं पहना था.
मस्ती भरी बातें करते करते कब हमारे होंठ आपस में चिपक गए और हमारे हाथ एक दूसरे के शरीर में रेंगने लगे, पता ही नहीं चला.
मैंने मानसी की एक टांग उठा कर अपने कमर पर रख ली और उसके चूतड़ और चूत को धीरे धीरे सहलाने लगा.
वह गर्म होने लगी और लोअर के अन्दर से मेरे लंड को पकड़ कर मसलने लगी.
जैसे जैसे हम दोनों गर्म होते जा रहे थे, एक दूसरे के शरीर से कपड़ों को नीचे सरकाते जा रहे थे.
जल्द ही हम दोनों फिर से पूरे नंगे हो गए.
इस बार मानसी को मैंने 69 अवस्था में ले लिया और हाथों से उसकी चूत को फैला कर अन्दर तक अपनी जीभ घुसा दी.
मानसी इतनी ज्यादा उत्तेजित हो गई थी कि उसने मेरे लंड को एक ही झटके में अपने गले के अंतिम छोर तक भर लिया और मेरे दोनों आंड को मसलने लगी.
हम दोनों ही पूरे जोश के साथ एक दूसरे को खा रहे थे माने कोई युद्ध हो रहा हो, जिसे हम दोनों ही जीतना चाह रहे थे.
मैंने उंगली से उसकी नर्म चूत को पूरा खोला और अन्दर के हिस्से को दांतों से चबा कर हल्का सा बाहर को खींचा, तो मानसी तड़प उठी.
अभी तक वह जो होंठों से मेरे लंड को चूस रही थी, अब दांतों का घेरा बना कर लंड चूसने लगी … जिससे एक अद्भुत तरंग मेरे मन में उठने लगी.
कुछ देर बाद मानसी का शरीर कांपने लगा तो मैंने चूत चाटना बंद कर दिया ताकि वह लम्बी टिक सके, पर वह अपनी चूत मेरे मुँह में घिसने लगी और अपने एक हाथ से मेरे सर को उठा कर चूत में ऐसे घुसाने लगी मानो कह रही हो कि मेरी चूत चाट कर ही मेरा पानी निकाल दो!
मैंने भी उसकी मन की बात समझ कर चूत चुसाई फिर से चालू कर दी और सिर्फ दो मिनट बाद ही उसका पूरा शरीर अकड़ने लगा.
मानसी का काम रस मेरे मुँह में समाता चला गया, पर मानसी ने लंड मुँह से नहीं निकाला बल्कि अकड़ने के दौरान और जोर जोर से लंड को चूसना चालू रखा.
उसके दांतों के वजह से मेरा पानी भी छूटने को हुआ तो मैंने उसकी गांड को थपक कर इशारा किया कि मेरा निकलने वाला है अपना मुँह हटा ले!
पर वह तो कुछ सुनना ही नहीं चाहती थी और चुसाई चालू रखी.
जल्द ही मेरा लावा फूटने को हुआ और मैंने मानसी के सर को अपने लंड पर दबाना शुरू कर दिया.
मेरा लंड पूरा उसके मुँह के अन्दर जड़ तक घुसा हुआ था, तुरंत ही मैं भी आह भरते हुए वीर्य छोड़ने लगा.
मेरा पूरा वीर्य मानसी के जीभ को छुए बिना उसके गले में उतरता चला गया और वहां से उसके पेट में … यानि उसे स्वाद का कोई अंदाज़ा नहीं लग पाया कि वीर्य का स्वाद कैसा था.
उसके बाद हम कुछ देर एक वैसे ही पड़े रहे.
मानसी मेरे आंडों के साथ खेल रही थी और मैं उसके चूतड़ सहला रहा था.
थोड़ी देर बाद हम दोनों सीधे हुए और एक दूसरे को चूमने लगे.
क्योंकि मानसी ने मेरा वीर्य पूरा पी लिया था तो उसकी जीभ पर स्वाद चढ़ा नहीं था इसलिए किस करते वक़्त मुझे कुछ अजीब नहीं लग रहा था.
पर मेरे मुँह में मानसी का काम रस भरा हुआ था, इस वजह से उसे खुद अपने रस की महक और स्वाद आ रहा था.
कुछ देर चूमने के बाद हम बात करने लगे और फिर से चूमने लगे.
ऐसा करते करते काफी वक़्त बीत गया.
अब मुझे भी काफी आराम मिल गया था इस वजह से मेरा लंड भी धीरे धीरे अकड़ने लगा था और मानसी के पेट से टकराने लगा था.
उसका आभास होते ही मानसी ने लंड को अपनी मुट्ठी में भर लिया और तुरंत नीचे सरक कर उसे मुँह में भर लिया.
मैंने मानसी को रोका और सीधा खड़ा हो गया.
मानसी भी उठने लगी तो मैंने उसे मना करके घुटनों के बल रहने को बोला और उसके बालों की चोटी जैसा बनाते हुए पकड़ कर उससे लंड चूसने के लिए बोला.
मैंने कहा- जैसा पोर्न फिल्मों में होता है, वैसे करो!
मानसी ने मुस्कुराकर मुझे देखा और मेरी नज़रों से नज़र मिला कर मेरे चूतड़ पकड़ कर आराम से लंड चूसने लगी.
बीच बीच में वह मेरे आंड भी चाटने लगी.
कुछ देर बाद मानसी में अपना मुँह हिलाना बंद कर दिया था, पर मैं उसका सर पकड़ कर उसके मुँह की चुदाई करने लगा था.
मैं अपना लंड उसके गले तक उतारने लगा.
जब उसे सांस लेने में तकलीफ होने लगी, तो उसने इशारे से मुझे रोका.
अब मैंने उसे वापस टी टेबल पर पैर खोल कर बैठा दिया और उसकी चूत को चाट कर गीला कर दिया.
उसको ऐसी बैठक में बैठ कर चूत चटवाना अच्छा लग रहा था तो वह मेरे सर को अपनी चूत में घुसाने सा लगी थी.
कुछ पल बाद उसे अंधेरे का सा अहसास हुआ तो उसने सबसे पहले खिड़की का पर्दा हटा दिया.
इससे कूपे में भरपूर उजाला हो गया और उसकी चूत भी चमकने लगी.
फिर उसने मेरे सर को पकड़ कर अपनी चूत में अच्छे से दबाना चालू कर दिया.
जब उसकी चूत अच्छे से गीली हो गई, तब मैं सीधा खड़ा हुआ और मानसी को चूमते हुए लंड चूत में घुसाने लगा.
पर लंड फिसल रहा था, तो मानसी ने लंड को पकड़ कर अपनी चूत के छेद में रखा और खुद हल्का सा आगे को हुई, जिससे लंड का टोपा चूत के अन्दर घुस गया.
मानसी ने उत्तेजना में अपने नाख़ून मेरी पीठ में गड़ा दिए. मैंने भी उत्तेजना में आकर एक ही झटके में पूरा लंड चूत के अन्दर घुसा दिया.
मानसी की घुटी घुटी से चीख निकली, पर हम दोनों के मुँह आपस में चिपके होने की वजह से आवाज बाहर नहीं निकल पाई.
अब मैंने अपनी रफ़्तार बढ़ा कर उसकी चुदाई चालू कर दी और मुँह को अलग कर लिया.
फिर थोड़ा पीछे को होकर खुद को आराम से ऐसा सैट किया कि हर झटका पहले वाले से ज्यादा जोर से मारा जा सके.
उसकी टांगें मेरे हाथ में थीं और गांड टी-टेबल पर टिकी थी.
लंड सीधा चूत की आखिरी सीमा पर चोट कर रहा था.
हर धक्के के साथ हम दोनों की मादक आआहह आह की सिसकारी निकल रही थी.
हम दोनों हवस के समंदर में गोते लगा रहे थे. बीच बीच में मैं उसके ऊपर झुक जाता और उसके दूध को अपने मुँह में भर कर खींच रहा था.
कभी हाथ से उसकी चूत के दाने को रगड़ देता था, तो कभी दूध को मरोड़ कर खींच देता था.
इधर लंड के झटके काफी तेज होने की वजह से मानसी जल्द ही अकड़ने लगी.
उसने अपने चरम पर आते हुए मुझे खींचा और अपने सीने से चिपका कर चूमने लगी.
उसी पल उसकी चूत का पानी निकल गया. अब चूत बहुत ज्यादा गीली हो गई थी और लंड को ऐसा लग रहा था जैसे वह मलाई के अन्दर आ जा रहा है.
मेरा लंड एकदम आराम से मानसी की नर्म गुलाबी चूत की चुदाई कर रहा था, मानसी दोनों हाथों को मेरे गले में लपेटा हुआ था, जिससे उसके स्तन मेरे सीने में गपे हुए थे. हमारे होंठ एक दूसरे को खाने में लगे हुए थे.
इस आसन में मानसी आराम से बैठी हुई थी और मैं भी बड़ी आसानी से खड़े होकर धक्के मार रहा था.
हमें चुदाई में कोई परेशानी नहीं हो रही थी.
हम दोनों ने इसी आसान में काफी देर तक चुदाई की और आगे भी ऐसे ही चुदाई का करने का विचार बनाया.
जैसे जैसे वक़्त निकलता जा रहा था, मानसी फिर से गर्म होकर अपनी चूत से पानी छोड़ दे रही थी.
फिर जब मेरा होने वाला होता था, तब मैं लंड चूत से बाहर निकाल कर कुछ देर शांति से खड़ा हो जाता.
इससे मेरा पानी अभी तक नहीं निकला था.
इस आसन में चुदाई करते हमें 30 मिनट से ज्यादा का वक़्त हो चुका था.
अब हमने अलग आसन में सेक्स करने का सोचा.
मैंने मानसी को ट्रेन की दीवार से चिपका कर सीधा खड़ा कर दिया, जिससे उसकी छाती दीवार की तरफ हो गई और पीठ मेरी तरफ.
उसकी गांड को थोड़ा बाहर निकाल कर मैंने उसकी एक टांग को अपने हाथ में संभाल लिया. उधर मानसी ने लंड पकड़ कर धीरे से सहलाते हुए अपनी चूत के मुहाने पर रख दिया.
उसी वक्त मैंने एक करारा शॉट दे मारा, जिससे लंड चूत की दीवार को आसानी से चीरते हुए अन्दर गहराई तक जा पहुंचा.
वैसे तो मानसी की चूत काफी खुल चुकी थी, पर जब भी लंड एक झटके में अन्दर डालता … तब तब उसे एक मीठे दर्द का अहसास होता.
एक बार फिर से हमारी चुदाई की ट्रेन अपनी रफ़्तार पकड़ कर वासना के रास्ते पर चल पड़ी थी.
हर धक्के के साथ उम्म हम्म आआह की सिसकारियां हम दोनों के मुँह से निकल रही थीं.
हम दोनों ही एक दूसरे को जी भर कर भोग लेना चाहते थे ताकि जब जुदाई हो तो इस पल के सहारे आने वाले वक़्त को याद कर सकें.
इसी तरह हमारी चुदाई चलने लगी और धीरे धीरे मानसी की गांड और बाहर निकलने लगी ताकि और मजा उसे मिल सके.
उसने थोड़ा सा पीछे मुड़ कर अपना एक हाथ मेरे गले में डाल लिया और मुझे अपनी तरफ को खींच कर मेरे होंठों को चाटना शुरू कर दिया.
ट्रेन के इस बंद कूपे में हम दोनों के लिए इससे ज्यादा रूमानी पल और क्या ही हो सकता था.
हमारी चुदाई चलते चलते एक घंटा से ऊपर हो चुका था.
मानसी तो ना जाने कितनी बार अपना काम रस छोड़ चुकी थी.
इस बार जब जब उसने अपना रस छोड़ा, तब वह बोली कि जान इतनी देर से चुदाई करते करते मैं थक गई हूँ. अब तुम भी अपना लावा निकल दो और मुझे चरमसुख का सुख दे दो.
मैंने भी उसकी बात मानते हुए अपने धक्कों की रफ़्तार बढ़ा दी, जिससे पूरे कूपे में ठप्प ठप्प की आवाज़ गूंजने लगी.
जल्दी ही मानसी चीखती हुई अपना काम रस छोड़ने लगी और उसके रस को अपने लंड पर महसूस करके, उसकी उत्तेजना में मैंने भी गुर्राते हुए अपना लावा मानसी की चूत में भरना शुरू कर दिया.
कुछ धक्कों तक मेरा लावा निकलता रहा और उसकी चूत को रस से पूरा भिगो दिया.
जब तक मेरा लावा निकलता रहा, तब तक हम दोनों ऐसे ही खड़े रहे.
फिर जब मैंने अपना लंड बाहर निकाला तो मानसी धम्म से नीचे गिर कर लम्बी लम्बी सांस लेने लगी.
चुदाई की यही खास बात है दोस्तो, जब तक आप चुदाई कर रहे हैं … थकान कम या नहीं महसूस होती है. पर जैसे ही आपका वीर्य निकल जाता है तो ऐसा लगता है मानो आपके शरीर से जान निकल गई.
कुछ बीस मिनट तक हम दोनों ऐसे ही पड़े रहे.
उस वक्त हम दोनों चिपके भी नहीं थे.
जब हमारी सांसें सामान्य हुईं, तब हम थोड़ा करीब आकर चिपक गए और एक दूसरे के नंगे जिस्म को सहलाने लगे.
कुछ देर बाद मैंने घड़ी देखी तो साढ़े तीन बज रहे थे.
हमारा स्टेशन एक घंटे में आने वाला था.
मैंने नैपकिन से मानसी की चूत को बड़े प्यार से साफ़ किया और जो नाश्ता बचा हुआ था, उसको खाकर अपने पेट की भूख मिटाने लगे.
खाना खाकर हमने बाहर जाने वाले अपने अपने कपड़े पहनने शुरू कर दिए.
कपड़े पहन कर पहले मानसी बाथरूम में अच्छे से फ्रेश होकर आई ताकि उसका भाई जो स्टेशन आने वाला था, उसे कोई शक न हो.
मानसी जब तक फ्रेश होकर आई, तब तक मैंने कूपे से सब सामान समेट लिया था.
फिर मानसी वापस आई तो मैंने सामान रखने में उसकी मदद की.
फिर मैं भी बाथरूम से होकर आया और हम आराम से सीट में बैठ कर बात करने लगे.
जब ट्रेन को पहुंचने में पांच मिनट बाकी थे तो मैंने उसका सारा सामान निकाल कर गेट पर रख दिया ताकि उसका भाई अन्दर ना आ पाए और मुझे देख कर फालतू का तमाशा ना करे.
कूपे से बाहर निकलने के पहले हम एक आखिरी बार जोर से चिपक कर गले लगे थे और काफी प्यार से एक दूसरे को होंठों को चूमा था.
खैर … फिर ट्रेन रुकी और मानसी का भाई उसे आकर ले गया.
मैं वहीं से एयरपोर्ट के लिए निकल गया और अगली फ्लाइट लेकर वापस अपने शहर आ गया.
दोस्तो, आपको ये हार्ड फक इन ट्रेन कहानी कैसी लगी, प्लीज मुझे मेल करके जरूर बताइएगा.
nehash01012003@gmail.com