बैक होल सेक्स विद GF का मजा मैंने चलती ट्रेन में लिया. मैंने पहली बार उसकी गांड मारी थी, उसकी कसी गांड तब तक कुंवारी थी.
फ्रेंड्स, मैं आयुष बिंदल आपको चलती ट्रेन में अपनी सैटिंग मानसी के साथ चुदाई का मजा ले रहा था.
कहानी के दूसरे भाग
ट्रेन के कूपे में सैटिंग को जबरदस्त पेला
में आपने अभी तक पढ़ लिया था कि मैं उसे एक बार चोद कर अलग होकर अपनी सांसों को नियंत्रित करने लगा था.
अब आगे बैक होल सेक्स विद GF का मजा:
चूंकि चुदाई के बाद हम दोनों ही काफ़ी थक गए थे इसलिए हम दोनों नीचे लेट गए और एक दूसरे से चिपक कर पड़े रहे.
थोड़ी देर बाद हमने सोचा कि खाना खा लिया जाए.
तो मानसी और मैं बारी बारी से वॉशरूम जाकर फ्रेश होकर आए.
हमारे बीच ये तय हुआ था कि कूपे के अन्दर कोई भी कपड़े नहीं पहनेगा.
इसलिए अन्दर आते साथ ही हमारे कपड़े उतर जाते थे.
क्योंकि सारा सेक्स नीचे गद्दे पर हो रहा था इसलिए हमने सीट पर बैठ कर खाना खाया.
इस वक़्त लगभग रात के 11 बज रहे थे.
खाना खाकर हम फिर से नीचे चिपक कर लेट गए और हमारे हाथ एक दूसरे के शरीर पर फिसलने लगे.
मानसी ने कहा- तुम्हारे साथ एक बार के सेक्स में मुझे 3 से 4 बार स्खलन हो जाता है. इतना मजा तो मुझे इतने सालों में दीपेश से आज तक नहीं मिला!
मैं बोला- यही हाल मेरा भी है, जितना साथ तुम मेरा देती हो … रश्मि ने आज तक एक बार भी ऐसा साथ नहीं दिया.
मानसी बोली- चाहती तो ये हूँ कि हम दोनों हमेशा हमेशा के लिए एक हो जाएं, पर इससे दो परिवार पूरी तरह से बिखर जाएंगे. हो सकता है कि हमारे बच्चे भी हमसे अलग हो जाएं.
मैंने भी उसकी बात का समर्थन करते हुए कहा- सच कह रही हो तुम, इसलिए जैसे अभी मिलते हैं वैसे ही आगे भी मिलना होगा. बस कोशिश ये करना कि जब तुम लोगों का ट्रांसफर हो तो मेरे शहर से ज़्यादा दूर ना हो!
वह बोली- हां यही कोशिश करनी पड़ेगी.
ये कह कर हम दोनों के होंठ आपस में चिपक गए.
इस बार हम दोनों एकदम आराम आराम से एक दूसरे को चूस रहे थे, कोई हड़बड़ी नहीं थी क्योंकि दोनों एक बार अच्छे से तृप्त हो चुके थे!
धीरे धीरे मानसी का हाथ मेरे लंड पर आया और वह उसे सहलाने लगी.
मेरा हाथ भी धीरे से मानसी की गांड को सहलाते हुए उसके गांड के छेद पर मचलने लगा.
मैंने उसकी गांड के छेद को कुरेदना शुरू कर दिया तो मानसी की सिसकारियां निकलनी शुरू हो गईं.
उसने कहा- आज तक मैंने वहां कभी कराया नहीं है!
मैंने कहा- लड़कियों के तीन छेद होते हैं और तीनों में मज़ा लेना चाहिए. बल्कि आदत होने के बाद सबसे ज़्यादा मज़ा दोनों को पीछे के छेद में ही आता है!
मानसी बोली- पर मैंने तो सुना है कि वहां बहुत दर्द होता है!
मैं बोला- दर्द तो शुरू में सामने से करने पर भी होता है, पर अब देखो मज़ा आता है कि नहीं!
वह कुछ सोचने लगी और बोली- ठीक है एक बार ट्राइ करते हैं, अगर ज़्यादा दर्द हुआ तो नहीं करेंगे.
मैंने उससे कहा कि पहले टॉयलेट जाकर अच्छे से पॉटी कर आओ.
वह बोली- मुझे नहीं आई है.
मैंने कहा- पहली बार है, दर्द ज़्यादा होगा उसके चक्कर में कहीं थोड़ी बहुत निकल ना जाए!
वह ‘ठीक है.’ कह कर गाउन पहन कर बाहर चली गई.
दस मिनट बाद आकर बोली- थोड़ी सी आई और मैंने अच्छे से रगड़ कर अपना छेद भी साफ कर लिया है.
हम दोनों फिर से चिपक गए.
इस बार मानसी ने मुझे नीचे लिटाया और खुद मेरे ऊपर आ गई.
उसके स्तन मेरे सीने में धंसे हुए थे और वह मुझे धीरे धीरे चूमे जा रही थी.
कुछ देर मेरे होंठों को चूमने के बाद जब हमारी हवस बढ़ने लगी तो वह नीचे को सरक कर मेरे गले और कान को चबाने लगी.
इससे हम दोनों की हवस बढ़ने लगी.
फिर वह नीचे सरक कर मेरी छाती को चूमती हुई मेरे निप्पलों से खेलने लगी, उन्हें चूमने व चूसने लगी.
मेरा लंड उसके पेट में रगड़ खाकर अपने पूरे आकार में आ चुका था और मानसी के अन्दर घुसने को मचल रहा था.
शायद उसने मेरी मान की बात जान ली और अपने एक हाथ को नीचे ले जाकर लंड को अपनी मुट्ठी में भर कर ज़ोर ज़ोर से मसलने लगी.
फिर वह नीचे सरक कर लंड को दोनों हाथों से थाम कर बोली- दीपेश का लंड तो मेरी एक हथेली के अन्दर ही समा जाता है और तुम्हारा तो दोनों मुट्ठी मिला कर भी थोड़ा बाहर है. अगर पहले पता होता कि तुम इतना मस्त हथियार रखते हो तो फालतू मैंने 7 साल दीपेश के साथ बर्बाद कर दिए.
मैंने कहा- तुम हम दोनों की तुलना करना छोड़ो और इस पल का आनन्द लो.
ये सुनते ही मानसी ने लप्प से लंड अपने मुँह में भर लिया और ज़ोर ज़ोर से चूसने लगी.
उसे भी पता था कि एक बार मेरा वीर्य निकल चुका है इसलिए अब जल्दी नहीं निकलेगा.
वह बहुत ज़ोर ज़ोर से लंड चूसे जा रही थी.
इस बार वह लंड के साथ ही आंड को भी मुट्ठी में मसल रही थी और उसे भी चूस रही थी.
क्योंकि हमारा मिलने का प्लान काफ़ी पहले बन चुका था इसलिए मैंने भी अपनी झांटें अच्छे से साफ कर रखी थीं.
इस वजह से मानसी को भी मेरा लंड और आंड चूसने में कोई परेशानी नहीं हो रही थी.
दस मिनट तक अच्छे से लंड चूसने के बाद वह धीरे धीरे ऊपर सरक कर मेरे मुँह के ऊपर बैठ गई, जिससे उसकी मखमली चूत बिल्कुल मेरे सामने थी.
मैंने भी देर ना करते हुए अपनी जीभ उसके हवाले कर दी और मेरे दोनों हाथ उसके मक्खन जैसे नर्म मम्मों को मसलने लगे थे.
मानसी मादक सिसकारियां भरती हुई अपनी कमर हिला रही थी.
इस वजह से मेरी जीभ को ज़्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ रही थी.
जैसे मानसी अपने आप बिना कुछ कहे मेरे मुँह पर बैठ गई और सेक्स में भरपूर सहयोग कर रही थी, ऐसा ही सहयोग अपने पार्ट्नर से आदमी बिस्तर पर चाहता है … वरना बीवी लाश की तरह पड़ी रहे, तो दोनों को कुछ भी आनन्द नहीं मिल पाता है.
इस अवस्था में मानसी मेरे ऊपर बैठने के कारण मेरी जीभ पूरी की पूरी उसकी चूत की गहराई में उतर चुकी थी और आसानी से में चूत चाट पा रहा था.
दूसरी तरफ मानसी बिल्कुल भी शांत नहीं थी.
मेरी जीभ उसके शरीर में करंट पैदा कर रहा था और वह उछल उछल कर अपनी मस्ती को प्रदर्शित कर रही थी.
सिर्फ़ पांच मिनट बाद ही वह अपने चरम पर पहुंच गई और ज़ोर ज़ोर से मेरे मुँह पर कूदने लगी.
मैं समझ तो गया था कि ये गई मगर जब तक मैं कुछ और सोच पाता, उसकी गुलाबी चूत से कमरस का फव्वारा फूट पड़ा और उस रसधार ने मेरे पूरे मुँह को भिगो दिया.
झड़ने के तुरंत बाद मानसी नीचे आई और मेरे मुँह को पूरा चाटने लगी, जिसमें उसका खुद का काम रस लगा हुआ था.
देर तक मेरे मुँह को चाटने के बाद वह मेरे सीने पर ही लेटकर सुस्ताने लगी.
पर मेरा लंड तो नाग की तरह फुंफकार रहा था.
मैं अपने दोनों हाथों से उसके बदन को आराम आराम से सहलाते हुए नीचे चूत के पास ले गया और थोड़ा ऊपर उठा कर एक झटके में अपना जागृत लंड मानसी की सुखी चूत में घुसा दिया.
इस अचानक हुए हमले से वह चीख पड़ी.
उसकी आवाज़ इतनी तेज थी कि अगर ट्रेन चल नहीं रही होती तो काफी दूर तक सुनाई देती.
शायद बाजू वाले केबिन में बैठी उस हसीन चुदासी लौंडिया ने आवाज सुन भी ली हो.
मानसी अब सीधी होकर तन कर बैठ गई.
मैंने धीरे धीरे धक्के लगाने शुरू कर दिए.
थोड़ी देर बाद जैसे जैसे उसकी चूत पानी छोड़ने लगी, मानसी भी मेरा साथ देने लगी और मेरे सीने पर दोनों हाथ रखकर उछलने लगी.
मेरे दोनों हाथ उसके चूतड़ों पर जमे हुए थे, जो उसे और ज़्यादा उछालने में मदद कर रहे थे.
आप ये मान लीजिए कि हर झटके के बाद मेरा लंड थोड़ा सा उसकी चूत से बाहर निकल जाता और फिर अन्दर होता था.
काफ़ी देर तक इस आसन में चुदाई के बाद मैंने मानसी की सीट पर डॉगी आसन में सेक्स करना शुरू किया.
उसके पैर को पूरा खोल कर चुदाई चालू की, पर इस आसान में आगे जगह ना होने के कारण जब धक्के लगते तो ट्रेन की बॉडी से मानसी का सिर टकरा रहा था.
उसे दिक्कत न हो इसलिए मैंने उसे अपनी गोद में पूरा उठा लिया और उसे सामने की दीवार से चिपका दिया ताकि हमारा संतुलन बना रहे.
मानसी ने अपने टांगों को मेरी कमर में पूरा लपेट लिया था क्योंकि ट्रेन चलते वक़्त काफ़ी हिलती है इसलिए मुझे अच्छे से खड़े होने में थोड़ी तकलीफ़ हो रही थी.
पर जब एक बार सही से खड़ा हो गया, तो मानसी ने अपने हाथों से लंड पकड़ कर चूत में घुसवा लिया.
शुरू में तो काफ़ी धीरे धीरे चुदाई हो रही थी और मानसी को दीवार से चिपका कर चोद रहा था, पर जैसे ही मुझे अच्छे से खड़े होते बन गया तो थोड़ा पीछे खसक कर ज़ोर ज़ोर से मानसी को उछाल उछाल कर चुदाई का आनन्द लेने लगा.
मैंने अपने दोनों हाथ से मानसी की गांड को अच्छे से संभाल रखा था ताकि वह कहीं गिर ना जाए.
मानसी ने भी टांगों के साथ मेरे गले को अपनी बांहों में एकदम से भर लिया था और हमारे होंठ आपस में भिड़े हुए थे.
काफ़ी देर तक इसी आसन में चुदाई करने के बाद मानसी का वजन उठाने की वजह से मेरा बदन दर्द करने लगा था.
मैंने उसे नीचे उतारा और दीवार के सहारे सीधी खड़ी करके मैं उसके पीछे खड़ा हो गया … यानि मानसी ट्रेन की दीवार की तरफ मुँह करके खड़ी हुई थी.
मैंने उसकी एक टांग उठा कर चुदाई करना शुरू कर दिया था.
मेरे हर झटके के साथ वह उछल जा रही थी, मेरे एक हाथ ने उसकी टांग को थमा हुआ था तथा दूसरा हाथ उसके स्तन को मसल रहा था.
मानसी ने अपने एक हाथ से मेरे गले को लपेटा हुआ था और दूसरे से अपना स्तन खुद मसल रही थी.
उसका मुँह पीछे की तरफ मुड़ा हुआ था, जिससे हमारे होंठ भी आपस में भिड़े हुए थे.
हर धक्के के साथ उसके गले से उम्म उंम्म की आवाज़ आ रही थी, पर होंठ चिपके होने की वजह से वहीं पर आवाज़ दम तोड़ दे रही थी.
इसी आसन में कुछ देर तक हमने चुदाई का आनन्द लिया.
इस बीच मानसी भी अपने चरम पर पहुंच कर थक गई तो मैंने उसे नीचे लिटा दिया और उसे ज़्यादा तकलीफ़ ना देते हुए उसके ऊपर आकर सबसे सरल आसान में चुदाई शुरू कर दी.
मानसी का कामरस निकल चुका था, इस वजह से उसकी चूत थोड़ी सूख गई थी.
मैंने उसे उल्टा घुमा कर घोड़ी बनने को कहा और कहा कि अपने बैग में से कोई चिकनाई वाली चीज़ निकाल लो, जिससे गांड में लगाया जा सके.
उसने अपने हैंड बैग जो बाहर ही लटक रहा था, उसमें से उसने वैसलीन निकाल ली.
मैंने थोड़ी सी वैसलीन अपने लंड पर लगाई और अच्छे से मसलने लगा.
तब तक मानसी घोड़ी बन कर बिल्कुल तैयार हो गई थी. उसे भी इस नये आनन्द का अनुभव जो लेना था.
फिर मैंने थोड़ी सी वैसलीन उसकी गांड के छेद में लगाई और धीरे धीरे छेद को मसलते हुए एक उंगली अन्दर डाल दी.
सच बता रहा हूँ दोस्तो, मानसी की गांड काफ़ी टाइट थी.
उसकी गांड में उंगली घुसेड़ने में मुझको भी काफ़ी ज़ोर लगाना पड़ रहा था.
जैसे तैसे उंगली उसकी गांड में घुस गई थी.
वह आह करके मेरी उंगली को अपनी गांड में जकड़ने लगी थी.
फिर मैंने उंगली को अन्दर बाहर करना शुरू किया तो मानसी मेरी उंगली के आनन्द से ही मस्त होने लगी थी.
उसने अब अपना सिर पूरा नीचे कर लिया था और अपनी गांड ऊपर उठा कर आगे पीछे करके सिर्फ़ मेरी उंगली से चुद कर मस्ती की अनुभूति कर रही थी.
उस वक़्त मुझे थोड़ा डर भी लग रहा था कि अगर लंड डालने की वजह से उसकी गांड फट गई तो क्या होगा.
यही सोच कर मैं डिब्बी से खूब ज्यादा सी वैसलीन निकाल कर मानसी की गांड में अच्छे से मलने लगा.
मैंने ज़रा ज़्यादा सी वैसलीन को लंड की टोपे पर लगा लिया, ताकि लौड़े की चोट आराम से हो.
कुछ देर तक उंगली से मानसी की गांड मसलने के बाद मैंने उसकी कमर को बिल्कुल चूतड़ों के पास से ज़ोर से पकड़ा और उसकी कमर को इतना ऊंचा रखा कि मुझे लंड को पकड़ कर गांड में ना डालना पड़े … बल्कि अपने आप धीरे धीरे घुस जाए.
मानसी की कमर को पकड़ कर लंड उसके गांड पर फिराने लगा, तो मानसी मस्ती में आने वाले ख़तरे से अंजान होकर बोली- अब अन्दर डाल दो … बहुत गुदगुदी हो रही है!
मैंने कमर को भींच लंड निशाने पर रखकर एक ज़ोर का झटका दे दिया, जिससे लंड का टोपा अन्दर घुस गया.
मानसी जो अब तक मस्ती में झूम रही थी, दर्द के मारे चिल्ला उठी और सीधी होकर उठने लगी.
मेरी पकड़ मजबूत होने के कारण वह हिल तो रही थी, पर लंड के ऊपर से हट नहीं पा रही थी.
मेरा लंड भी छिल चुका था और काफ़ी दर्द कर रहा था.
मानसी रोती हुई बोली- प्लीज़ निकाल लो बाहर … मुझे नहीं करवाना. बहुत दर्द हो रहा है!
मैंने उसे गर्दन पर चूमते हुए कहा- जान, दर्द तो मुझे भी हो रहा है पर ये तो होना ही था, अब बस थोड़ा सा और है फिर सारा दर्द गायब हो जाएगा.
कुछ देर मनाने के बाद वह राज़ी हो गई.
उसने अपना सिर नीचे को चिपका लिया और गांड को हवा में उठा लिया.
अब तक मेरा दर्द भी थोड़ा कम हो गया था तो धीरे धीरे लंड पर दबाव बढ़ाता चला गया.
जैसे जैसे लंड अन्दर जा रहा था, मानसी दर्द की वजह से अपनी मुट्ठी और आंख भींचे जा रही थी.
मेरा मुँह भी दर्द के मारे खुलता जा रहा था.
बहुत आराम आराम से लंड गांड में करते हुए काफी देर बाद मैंने लंड पर दबाव बढ़ाना शुरू किया और धीरे धीरे अन्दर डालने लगा.
हम दोनों को आनन्द से ज्यादा अभी दर्द का अनुभव हो रहा था.
जब आधे से ज्यादा लंड अन्दर चला गया तब मैंने धीरे धीरे धक्का मारना शुरू कर दिया.
मानसी को दर्द तो हो रहा था पर अब शायद उसे थोड़ा थोड़ा आनन्द भी मिल रहा था.
कुछ देर तक आराम से करने के गांड मरवाने के कारण उसकी गांड काफी खुल गई थी.
इस वजह से अब हमें आसानी हो रही थी.
फिर मैंने बाकी के लंड को अन्दर डालना शुरू किया और थोड़ी देर में वह भी पूरा अन्दर चला गया.
पूरा लौड़ा पेलने से पहले की तुलना में मानसी को दर्द भी उतना नहीं हुआ.
अब हमने चुदाई का एक नया आनन्द लेने की तैयारी की और मैंने मानसी की गांड को अच्छे से ऊपर उठा कर अपने लंड पर सैट कर लिया.
मैंने धक्के लगाना शुरू कर दिया था.
हम दोनों की हम्म आआह्ह के रूप में सिसकारियां निकलने लगी थीं.
बैक होल सेक्स विद GF का मजा आने लगा.
धीरे धीरे मेरे झटके भी तेज होने लगे और मानसी को भी शायद अच्छा लगने लगा था.
जब कुछ सामान्य गति से चल रहा था, तो मैंने एक जोर का तमाचा मानसी की गोरी गांड पर मारा … जिससे वह चिहुंक उठी.
वह कराह कर बोली- आह … दर्द होता है ऐसे करने पर!
मैं इस पल का पूरा आनन्द लेना चाहता था तो मैं चुप रहा मगर मेरा मूड बराबर बना रहा कि कुछ देर बाद वापस चमाट मारूँगा.
कुछ ही देर में मेरे धक्के स्पीड में चालू हो गए थे और मैं मानसी की गांड पर लगातार चपत लगाए पड़ा था.
हालांकि सबसे पहले वाले की तुलना में काफी धीरे मार रहा था, पर इतने जोर से अब भी मार रहा था कि उसे दर्द हो और गांड लाल हो जाए.
काफी देर तक इसी आसन में चुदाई के बाद मानसी थक गई और चुदाई करते काफी वक़्त भी हो गया था तो मैंने गांड से लंड निकाल कर उसी आसन में चूत में पेल दिया और बहुत जोर जोर से झटके मारने लगा.
जल्द ही मानसी ने अपना काम रस छोड़ दिया और मेरा भी वीर्य निकलने का वक़्त आ गया था.
कुछ तगड़े धक्कों के बाद थोड़ा जोर से चीखते हुए मैंने अपना लावा मानसी के अन्दर डाल दिया.
उसकी चूत पसीने और मेरे वीर्य से सराबोर हो गयी.
जैसे ही मैंने मानसी की कमर को छोड़ा, वह एक झटके से एक तरफ ढुलक गई.
उसकी सांस धौंकनी की तरह चल रही थी और पूरा बदन पसीने से सराबोर हो चुका था.
मेरा वीर्य उसकी जांघों पर बहा जा रहा था. मैं भी थक कर चूर हो चुका था, तो उसके बगल में लेट गया.
हम दोनों आंखें बंद करके अपनी पानी सांसों को नियंत्रित करने लगे.
दोस्तो, एक बार फिर से मैं आयुष आप सभी से यही कहने आया हूँ कि मैं पूरी कोशिश करता हूँ कि आपके मेल के जबाव जल्द से जल्द दे सकूँ.
मगर आपका प्यार इतनी अधिक तादाद में आ रहा है कि मैं चाह कर भी सबको जबाव नहीं दे पा रहा हूँ. आप सभी का बहुत बहुत शुक्रिया कि आपको मेरी सेक्स कहानी पसंद आ रही है.
इस बैक होल सेक्स विद GF कहानी के अगले भाग में आपको आगे का मजा लिखूँगा.
प्लीज अपने मेल व कमेंट्स भेजते रहिए.
धन्यवाद.
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