Wo Chodah Din - 12
ब्लाइंड सेक्स कहानी में मेरी सहेली को पता चल गया था कि मैं किसी लड़के से चुदी हूँ. उसने पूछा तो मुझे लगा कि मैं इसे भी उससे चुदवा देती हूँ.
कहानी का पिछला भाग: ख़ास सहेली के साथ लेस्बियन मजा
यह कहानी सुनें.
अब आगे ब्लाइंड सेक्स कहानी:
मेरी आंख सुबह 8 बजे खुली। देखा कि हम दोनों नंगी ही पड़ी थी।
मैंने कविता को जगाया.
उसने जागते ही मुझे गले से लगाया तो मैंने भी उसके दोनों निप्पल सहला दिये।
उसके बाद हम दोनों ही शावर के नीचे एक साथ नहाई और थोड़ी देर एक दूसरे के बदन को सहलाया।
बाहर आते ही कपड़े पहन कर ब्रेड चाय लेकर हम दोनों अपनी अपनी जगह निकल गई।
आज राजीव को गए बारहवां दिन था।
बस दो दिन और बाकी थे.
मैं बहुत उत्साहित थी, राजीव से मिलने का इंतजार भी था।
दिन भर ऑफिस में बहुत काम रहा, शाम को 6 बजे मैं घर आई।
तो देखा गौरव गेट पर ही मेरा इंतजार कर रहा था.
मैंने दरवाजा खोला और गौरव के साथ अंदर आईं।
गौरव अंदर आते ही मुझसे चिपकने लगा।
मैंने उसको समझाया- अभी थकी हुई आई हूँ। थोड़ा आराम करना है। तू वेट कर ले. 8 से 10 का टाइम तुझे ही दूंगी।
गौरव उठा और हम दोनों के लिए चाय बना कर लाया।
चाय पी कर मैं थोड़ी देर वहीं सोफे पर ही लेट गई।
गौरव मेरे पैरों की तरफ बैठ कर मेरी दोनों टांगें दबाने लगा।
उसकी इस हरकत को देख कर मुझे उस पर प्यार आया तो मैंने उठकर उसको एक चुम्बन भी दिया।
पर वो बस मेरी टांगें दबाने में लगा था।
टांगें दबवाने से मुझे इतना आराम महसूस हो रहा था कि मुझे पता ही नहीं लगा मुझे फिर से नींद आ गई।
ठीक 8:00 मुझे गौरव ने जगाया.
मैंने देखा कि टेबल पर हम दोनों के लिए खाना लगा था।
मैंने आश्चर्य से गौरव की तरफ देखा तो उसने बताया, “आप थकी हुई थी इसलिए मैंने जोमैटो से आर्डर करके खाना मंगा लिया।”
सच में गौरव की इस हरकत पर मुझे बहुत प्यार आ रहा था।
मैंने फिर से दोबारा उसके होठों पर एक चुंबन दिया।
गौरव को सोफे पर बिठाकर मैं उसकी गोदी में से रख कर लेट गई।
अब गौरव भी रोटी का एक-एक कौर तोड़कर सब्जी लगाकर मेरे मुंह में डाल रहा था, और मैं लेटे-लेटे ही खाना खा रही थी।
बहुत दिनों बाद इतने प्यार से किसी ने मुझे खिलाया था।
दिल तो कर रहा था, कि कपड़े उतार कर गौरव पर चढ़ जाऊं।
पर मैं खुद को काबू में ही रखना चाहती थी।
हम दोनों के खाना खाने के बाद गौरव ही सारे बर्तन उठाकर रसोई में रखकर आया।
तब तक सोफे पर लेटे-लेटे ही मैंने अपनी शर्ट के सारे बटन गौरव के लिए खोल दिए।
अब मेरी ब्रा के अंदर छिपी मेरी दोनों चूचियां और मेरा पेट गौरव के सामने खुला हुआ था।
गौरव मेरे बराबर में फर्श पर बैठकर मेरी चूचियों का वह ऊपरी भाग जो ब्रा से ऊपर बाहर निकले भाग को चाटने लगा।
मुझे उसका इस तरह चाटना अच्छा लग रहा था।
थोड़ी देर वहां चाटने के बाद गौरव ने मेरी जींस खोलने की कोशिश की।
मैंने नीचे हाथ करके गौरव की पैन्ट कर हाथ मारा।
तो वो टाइट हो चुका था।
मैंने भी अपने चूतड़ ऊपर करके गौरव को अपनी जींस उतारने में मदद की।
गौरव ने मेरी जीन्स के साथ ही मेरी कच्छी भी उतार फेंकी।
वहीं फर्श पर बैठे बैठे गौरव एक हाथ से मेरी चूचियों के ऊपरी भाग को सहला रहा था और दूसरे हाथ से मेरी चूत के दाने को मसलने लगा।
अब तो गौरव पूरी तरह से ट्रेंड हो गया था।
उसको पता था कि एक औरत को कैसे उत्तेजित किया जाता है।
अब गौरव को कोई जल्दी भी नहीं थी, और न ही मुझे!
वो आराम आराम से मेरे दाने से सहला रहा था।
मैं भी आंख बंद करके उत्तेजना का आनंद ले रही थी।
कुछ देर बाद मुझे लगा कि वो मुझे इतना आनंद दे रहा है तो मेरा भी कोई फर्ज बनता है न।
मैंने एक हाथ नीचे करके उसकी पैन्ट की चैन खोल कर उसका खड़ा लौड़ा बाहर निकल लिया और हल्के हाथ से सहलाने लगी।
कुछ देर बाद गौरव ने मुझसे पूछा, “आपकी तबीयत तो ठीक है न?”
“हम्म” मैंने बस इतना ही जवाब दिया।
गौरव ने फिर बोला, “अगर तबियत ठीक नहीं है तो मैं दवाई ला देता हूं।”
“अरे बुद्धू, जो दवाइयां अभी तू दे रहा है, उस से आराम बहुत मिल रहा है। बस यही दवाई देता रह।” मैंने गौरव के लौड़े को सहलाते हुए कहा।
तब तक गौरव ने भी अपनी पैन्ट और अंडरवियर उतार दिया।
मैं उसकी टांगों को भी सहलाने लगी।
धीरे धीरे हम दोनों की उत्तेजना बढ़ने लगी।
गौरव उठकर मेरी एक टांग उठा कर वहां सोफे पर बैठ गया और मेरी टांग उसने अपनी गोदी में रख ली।
मेरी चूत थोड़ी सी गीली होती देख उसने अपनी एक उंगली अंदर सरका दी और धीरे धीरे अंदर बाहर करने लगा।
मैं भी अपने एक पैर से उसके लौड़े को मसलने लगी।
मैंने अपने हाथ पीछे ले जा कर अपनी ब्रा का हुक खिला और शर्ट के साथ ब्रा भी उतार कर फेंक दी।
मेरी चूचियों को खुला देख कर गौरव सब कुछ छोड़ कर ऊपर आ गया और मेरी चूचियों को खाने को उतावला हो गया।
मैं उठकर बैठ गईं गौरव भी मेरी चूचियों को मुंह में डाल पर पीने लगा।
मैंने उसकी शर्ट और बनियान भी उतार दीं और मैं भी उसकी छाती पर हाथ फिराने लगी.
गौरव तो जैसे मेरी चुचियां देख कर पगला जाता था।
मैंने गौरव को अपने सामने खड़ा किया और उसके लंड-मुंड से अपने निप्पल सहलाना शुरू कर दिया।
“आह…” अचानक गौरव के मुंह से निकला।
मैंने गौरव का पूरा लौडा अपनी दोनों चूचियों के बीच में दबा लिया।
गौरव भी आगे पीछे होकर मेरा चूची मैथुन करने लगा।
मैं भी दोनों चूचियां हिला कर उसका साथ देने लगीं।
अपना जोश बढ़ता देख गौरव ने अपना लंड वहां से बाहर निकाला।
मैंने आगे बढ़ कर उसका लौड़ा अपने हाथ से थोड़ा ऊपर करके उसकी दोनों गोटियों को अपने मुंह से चूसना शुरू कर दिया।
गौरव की “आह… आह…” की आवाज पूरे हाल में गूंजने लगी।
मैं भी अब नीचे से गीली होने लगी थी।
एक दूसरे से ऐसे ही खेलते खेलते एक घंटा बीत गया था।
मैंने वहीं सोफे पर अपनी कमर टिका कर अपने दोनों टांगें खोल कर गौरव को निमंत्रण दिया।
गौरव तो शायद इसी इंतजार में था।
उसने बिना एक भी सेकंड गंवाए अपने लौड़े को मेरी चूत के मुहाने पर टिका दिया।
मैंने नीचे से हल्का सा जोर मारा तो सीधा अंदर।
गौरव हौले हौले धक्के मारने लगा।
मैंने उसको धक्के थोड़ा तेज करने को बोला।
एकदम गौरव की स्पीड बढ़ गई।
मैं खुद ही अपने हाथों से अपनी चूचियों को दबाने लगी।
गौरव भी फुल स्पीड से गाड़ी चलने लगा।
गौरव और मेरे बीच जीतने की होड़ लगी थी।
कुछ देर के घमासान के बाद अचनाक शांति … गौरव निढाल हो कर मेरे ऊपर लेट गया।
घड़ी में 10 बजने में थोड़ा ही समय बाकी था.
मैंने गौरव को अपने ऊपर से उठाया और वॉशरूम जाकर साफ सफाई करके आई।
गौरव भी तैयार हो कर अपने घर निकल गया।
मैंने अपना बिस्तर ठीक किया और राजीव को कॉल किया हमेशा की तरह राजीव ने पहली कॉल पर ही मेरा कॉल उठा लिया।
मैंने राजीव से अल्बा के बारे में विस्तार से पूछा।
राजीव ने भी मेरी आज पूरी दिनचर्या पूछी और फिर हम दोनों ने फोन रख दिया।
मैं भी अपने बिस्तर में आ कर सो गई।
अगली सुबह मैं अपने समय पर 5.30 बजे उठ गई बिल्कुल फ्रेश।
राजीव को गए आज तेरहवां दिन था.
‘कल देर रात राजीव आने वाले हैं’ ये सोच कर ही मैं बहुत खुश हो गई।
अभी मैं अपने काम निपटा हो रही थी कि 6.30 बजे करीब कविता का कॉल आ गया।
वो बोली, “यार एक बात तो पूछना ही भूल गई।”
“क्या?” मैंने पूछा।
“अरे वो कौन था जिसको कॉल पर तूने उस दिन आने को मना किया था?” कविता ने सवाल दागा।
मैंने उसको बहुत टालने की कोशिश की पर वो नहीं मानी।
तो मैंने बोल दिया- चल शाम को मिलना तब बताऊंगी।
मैं नाश्ता करके ऑफिस चली गई.
शाम को 4.30 बजे ही कविता मेरे ऑफिस ही आ गई।
मुझे उसके इतनी जल्दी आने की उम्मीद नहीं थी।
पर आ ही गई, तो क्या कर सकती थी।
हम लोग रास्ते में खाते पीते घर पहुंचे।
घर आते ही कविता फिर से वही सवाल करने लगी।
पहले तो मैं उसको टालती रही पर जब उसके जिद पकड़ ली तो मेरे दिमाग में एक खुराफात सूझी।
फाइनली मैंने कविता को 9 बजे तक अपने पास रुकने को बोला।
अभी हम बात कर ही रहे थे कि गौरव का कॉल आ गया।
मैंने कॉल उठाते ही सीधा सवाल किया, “कितनी जल्दी आ सकता है ये बता?”
गौरव बोला, “बस 10 मिनट में।”
“जल्दी आ।” बोलकर मैंने फोन काट दिया।
कविता ने मुझे घूरते हुए पूछा, ये वही था क्या?”
“हां” मैं भी छोटा सा जवाब दिया।
“कौन है? क्या मामला है? कुछ तो बता?” कविता ने फिर पूछा।
“तू उठकर दो-तीन कप चाय बना ले बस। बाकी जो मैं बोलती हूं करती जा।” मैंने कविता को जवाब दिया।
अभी कविता रसोई में चाय बना ही रही थी कि दरवाजे की घंटी बजी।
मैंने खिड़की से देखा बाहर गौरव की ही बाइक खड़ी थी।
मैंने दरवाजा खोलकर गौरव को अंदर ले लिया.
गौरव को सोफे पर बैठने का इशारा करके मैं रसोई में गई कविता के पास गई।
कविता को यहीं रुकने का इशारा करके मैंने एक कप चाय उठाई साथ में थोड़ा स्नैक्स ले कर ऊपर चेतन के रूम में रख आई।
नीचे आ कर मैंने गौरव को ऊपर जा कर चाय पीने को बोला।
और बोल दिया कि जब तक मैं ना बुलाऊं नीचे मत आना।
वो तो बेचारा वैसे ही मेरी हर बात चुपचाप मान लेता है।
तो बिना कुछ बोले ऊपर चला गया।
मैं कविता के साथ चाय ले कर हाल में आ गई।
कविता ने पूछा जो आया था वो कहाँ गया।
मैंने बोला, “उसको छोड़ तू मेरे पर फोकस कर न!”
और चाय पीते पीते ही मैंने कविता का टॉप उतार फेंका।
कविता के अंदर तो आग ही इतनी है कि एक बार उसके बदन को हाथ लगाने की देर है फिर वो सब कुछ भूल कर कामान्ध हो जाती है।
आज भी यही हुआ.
जैसे ही मैंने उसका टॉप उतारा, उसने खुद ही चाय का कप रख के अपनी ब्रा का हुक खोल दिया।
उसके दोनों दुदू फटाक से उछल कर बाहर आ गए।
और कविता अपनी चूची पकड़ कर मेरे मुंह में उड़ेलने लगी।
मैं भी कविता के चूचूक से खेलते खेलते ही चाय का आनंद लेने लगी।
इसी बीच कविता ने खुद ही अपनी जींस भी उतार दी।
अब वो सिर्फ पैन्टी में ही बैठ कर चाय पी रही थी।
और मैं चाय पीते हुए उसके चूचूक से खेल रही थी।
चाय खत्म करते ही मैं कविता पर टूट पड़ी।
“आह… रुक जाआआ… कमीनी।” कविता ने कुसमुसाते हुए बोला।
पर मेरा तो जोश बढ़ता ही जा रहा था।
कविता नीचे फर्श पर लेट गई।
मैं कविता की टांगें चाटने लगी।
कविता भी अब सिसकियां ले रही थी।
मैंने खुद ही अपने सारे कपड़े भी उतार दिया और कविता के बदन से लिपट गई।
कविता की जीभ मेरी जीभ के साथ ताल मिलाने लगी।
कविता मेरे पूरे बदन को चूम रही थी और मैं उसकी मोटी गांड को सहला रही थी।
मैंने कविता की चूत के दाने पर हाथ रखा तो कविता चिहुंक उठी, बोली, “यार आज तो डिल्डो भी नहीं है।”
पर मैं कविता की टांगों के बीच आ गई अपनी जीभ से कविता की चूत का दान चाटने लगी और एक उंगली उसकी चूत के अंदर सरका दी।
कविता मेरी चूचियां दबाते हुए सिसकियां भरने लगी।
अब कविता चूतड़ उछाल के अपनी चूत को मेरी तरफ ठेलने लगी।
कविता अपनी चूत को उचकने हुए बोली, “आज डिल्डो तो लाई नहीं मैं! तू उंगली ही पूरी अंदर तक सरका दे।” बहुत मचल रही है अंदर से।
मैंने सीढ़ियों की तरफ कविता की पीठ कर दी, उसकी टांगें अपनी तरफ घुमा ली।
अब सामने सीढ़ियां मुझे अच्छे से दिखाई दे रही थी।
मैंने मोबाइल उठा कर गौरव को मैसेज किया, “नंगा होकर नीचे आ जल्दी।”
और मोबाइल साइड में फेंक कर कविता की चूत चाटने लगी।
कविता बार बार मुझे उंगली अंदर करने का आग्रह कर रही थी।
पर मैं बस उसके दाने को ही चाट रही थी।
कविता की बेचैनी इतनी बढ़ गई कि उसने खुद ही अपनी उंगली अंदर सरका ली और खुदाई सी करने लगी।
मैंने कविता की उंगली बाहर निकाल कर अलग की और फिर से उसके दाने को सहलाना शुरू कर दिया।
कविता से रुका नहीं जा रहा था, वो बार बार मुझे उंगली से करने को बोलने लगी।
तभी ऊपर से सीढ़ियों से मुझे गौरव नीचे आता दिखाई दिया।
वो बिल्कुल नग्न अवस्था में धीमे पांव से नीचे आ रहा था।
उसका लंड भी खूंटे की तरह सीधा खड़ा था।
मेरे चेहरे पर उसको देखते ही मुस्कुराहट आ गईं।
पर वो नीचे कविता और मुझे इस हालत में देख कर ठिठुक गया और सीढ़ियों पर ही रुक गया।
मैंने वहीं पड़ा मेरा दुपट्टा उठाकर कविता की आंखों पर बांधा तो कविता पूछने लगी, “ये क्यों भई?”
मैं बोली, “सरप्राइज़ है, तू रुक बस।”
और कविता की आंखों पर दुपट्टा बांध दिया।
मैंने गौरव को आंख के इशारे से नीचे आने को कहा।
अब वो भी दबे पांव नीचे उतरा और हम दोनों के पास आ कर खड़ा हो गया।
मैंने कविता को वहीं फर्श पर लिटा लिया।
सोफे की कुशन उठा कर कविता की गांड के नीचे लगाई तो कविता ने खुद ही अपनी दोनों टांगें खोल दी।
मैं उसकी टांगों के बीच में हाथ बढ़ा कर फिर से उसकी चूत के दाने को सहलाने कही।
“उंगली अंदर कर यार!” कविता ने लगभग चिल्लाते हुए बोला और बार बार अपने चूतड़ ऊपर को उछालने लगी।
मैं कविता की टांगों के बीच से हट कर उसके बराबर में आ गईं अब मैं आराम से एक हाथ से उसका दाना सहला सकती थी और दूसरे हाथ से उसकी चूचियों को।
गौरव को आंख के इशारे से मैंने कविता की टांगों के बीच में आने को बोला।
गौरव कोई बेवकूफ तो था नहीं वो भी समझ चुका था कि आज उसे नई चूत मिलने वाली है.
वह घूमकर कविता की टांगों के बीच आकर अपनी पोजीशन बना कर बैठ गया और मेरे इशारे का इंतजार करने लगा।
मैंने अपने दोनों हाथों से कविता की चूत को खोला और जीभ से एक बार उसको अच्छे से चाटा।
कविता ने तुरंत अपने चूतड़ ऊपर उछाल कर मेरी जीभ का स्वागत किया।
मैंने गौरव को सिर्फ हल्का सा इशारा ही किया कि उसने आपका लंड पूरा एक ही बार में कविता की चूत में गाड़ दिया।
“उई… माँ आअ ….” कविता चिल्लाई।
पर तब तक गौरव के धक्के चालू हो चुके थे।
कविता ने आंख से पट्टी हटाने की कोशिश की पर मैंने उसके दोनों हाथ पकड़ लिए और अपने होंठ उसके होठों पर रख दिया।
कविता कुछ बोलना चाह रही थी पर उसके मुंह से बस “घे…घे…घे…” की हो आवाज निकल पा रही थी।
गौरव के धक्कों की थाप बढ़ती जा रही थी।
कुछ देर बाद ही मैंने महसूस किया कि अब कविता कुछ बोलने की कोशिश नहीं कर रही थी बस अपने चूतड़ उचका उचका कर गौरव की धक्कों के साथ अपनी गति मिलाने की कोशिश करने लगी।
अब मैंने कविता को ढीला छोड़ दिया और उसकी चूचियों से खेलने लगी।
कविता भी कुछ नहीं बोल रही थी।
कुछ मिनट तक धक्के मारने के बाद अचानक गौरव ने कुछ झटके जोर जोर से मारे और फिर रुक गया.
तो मैंने आंखों के इशारे से गौरव से पूछा.
उसने भी इशारे से ही बताया कि वो खलास हो गया है।
मैंने कविता की चूचियों से खेलते हुए ही गौरव को इशारे से तुरंत ऊपर जाने को बोला।
मेरा इशारा समझते ही वो भी दबे पांव वहां से ऊपर लौट गया।
कविता बार बार अपनी आँखें खोलने की कोशिश कर रही थीं।
वह भी शायद डिस्चार्ज हो चुकी थी।
वो ब्लाइंड सेक्स का मजा लेने रिलेक्स हो कर आराम से लेट गई।
मैं भी कविता के ऊपर से हट गई.
अब वो आराम कर रही थी, अपनी आँखें भी खोलने की कोशिश नहीं कर रही थी।
मैंने पूछा, “कुछ खाएगी? लाऊं क्या?”
वो मुस्कुराते हुए बोली, “हां! तुझे खाऊंगी।” “कौन है? ये बता ना?”
मैंने हाथ बढ़ा कर कविता की आँखें खोल दी।
कविता ने चारों तरफ देखा फिर उठ कर दोनों कमरों और वॉशरूम में भी गई।
वापस आ कर मेरे पास सोफे पर बैठते हुए फिर पूछा, “अरे कौन था बता ना?”
मैंने बोला, “तेरा सरप्राइज़!”
हम दोनों एक दूसरे की तरफ देख कर हंसने लगी।
मैंने पूछा- तू बस इतना बता कि तुझे ब्लाइंड सेक्स में मजा आया या नहीं?
कविता ने मुझे गले लगाते हुए कहा, “यार मजा तो इतना आया कि तू दुबारा सरप्राइज़ दे, तो मैं आज रात तेरे पास ही रुक जाऊं!”
तभी मैंने आंख उठा कर घड़ी देखी।
9 बजने वाले थे।
मैंने कविता को बोला- आज रुकना नहीं है। बस 9 बजे का टाइम तय हुआ था।
और मैं उठ कर अपने कपड़े वहां से हटा कर नाइटी पहनने लगी.
कविता ने भी घड़ी देखते ही अपने कपड़े पहनने शुरू कर दिए।
तैयार हो कर कविता ने मुझे गले लगाया और ‘बाय’ बोल कर निकल गई।
कविता के जाते ही मैंने दरवाजा बंद किया और गौरव को आवाज लगाई.
वो नंगा ही फिर से नीचे आ गया। उसके नीचे आते ही मैंने अपनी नाईटी उतार फेंकी और उसको लिपट गई।
गौरव भी शायद मेरी ही इंतजार में था।
हम दोनों ने एक घंटा एक दूसरे के बदन से खूब खेला और 10 बजे मैंने गौरव को भी रवाना कर दिया।
गौरव के जाते ही मैं नहा कर फ्रेश हुई।
डिनर खुद बनाने का मन नहीं था, तो अपने लिए डिनर का ऑर्डर करने के बाद मैंने राजीव को कॉल लगाया।
10 मिनट उनसे बात की और उनकी वापसी का प्लान पूछा।
उन्होंने बताया कि परसों दिन में 11 बजे तक वो वापस आ जाएंगे।
मैं बहुत थकी हुई थी राजीव से बात करते ही कई तुरंत सो गईं।
अगले दिन मेरी आंख सुबह 7 बजे खुली।
आज राजीव को गए चौदहवां दिन था।
मैं उनका इंतजार बेसब्री से कर रही थी।
नहाकर नाश्ता करके मैं ऑफिस के लिए निकल गई।
शाम को मैं ऑफिस से 4 बजे ही निकल गयी।
बाज़ार गयी राजीव के लिए गिफ्ट खरीदा और अपने लिए भी दो नई नाइटी खरीदी और घर आकर घर को संवारना शुरू किया।
आज की रात राजीव के इंतजार में ही काटने वाली थी।
थैंक्स दोस्तो, शायद आप लोगों को मेरी लेखनी पसंद आए।
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