सरकारी अफसर महिला के साथ वासना का रिश्ता- 2

Views: 249 Category: Hindi Sex Story By rahulsrivas75 Published: May 10, 2026 📖 8 min read
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रोमांस स्टोरी में मैंने एक अनजान भाभी से बस और ट्रेन में दोस्ती की, उसका दिल जीता और अपने साथ घुमाने फिराने लगा. मेरा असली मकसद उसके साथ सेक्स का मजा लेना था.

कहानी के पहले भाग
हमउम्र भाभी को चोदने की ख्वाहिश
में आपने पढ़ा कि मैं कम उम्र की कई लड़कियां चोद चुका था. अब मेरी तमन्ना किसी हमउम्र महिला को चोदने की थी.
ऐसी ही एक महिला से मेरी दोस्ती हो गयी थी.

अब आगे रोमांस स्टोरी:

कविता काफी भद्र और शालीन महिला थी।
साथ में टैक्स विभाग की उच्च स्तरीय अधिकारी भी थी।
तो हिम्मत भी नहीं हो रही थी कि सस्ती बात करूँ।

मैं भी एक भद्र और शालीन पुरुष की तरह ही व्यवहार कर रहा था जो कि काफी मुश्किल काम था।

मेरा दिल कहता था— इतनी मेहनत से मैं यहाँ तक पहुँचा हूँ, तो लगे रहो मुन्ना भाई! ये भद्र महिला एक दिन जरूर टाँग उठा के मेरा लंड अपनी चूत में लेगी।

इस बीच मेरी वाइफ अपने बेटे के पास चली गई, तो चूत मिलना भी बंद हो गया।

बारिश अपने जोर पर थी।
तो एक रात फिर कविता का फोन आया।

थोड़ी देर इधर-उधर की बात की तो समझ में आ गया कि वो घर से अलग अकेलापन महसूस कर रही है।

मैंने कहा, “आप ऐसा करो, मेरे पास आ जाओ। कुछ बढ़िया सा बनाते हैं। आप भी अकेली हो, मैं भी अकेला। साथ में ही भोजन कर लेंगे।”
कविता, “इससे अच्छा है कि हम दोनों बाहर डिनर को चलें। आउटिंग भी हो जाएगी और डिनर भी।”

मेरा तो लंड ही मुरझा गया।
मैंने सोचा था कि घर आएगी तो चोदने में आसानी होगी।
मैं कोई मौका ढूँढ के कविता को सीड्यूस (काम वासना को जगा कर) कर सकता था।

खैर, जो मिल रहा था उसी में खुश था।

फटाफट रेडी हुआ— जीन्स, शर्ट, कुर्ता, कामुक परफ्यूम, क्लीन शेव के साथ।
उसको लेकर सिटी से दूर गोवा हाईवे पर एक स्टार टाइप ढाबे पर आ गया।

बारिश थोड़ी अब रुक चुकी थी, पर हल्की फुहार अभी भी थी, जिसको हम बर्दाश्त कर सकते थे।

वहाँ काफी भीड़ थी।
मौसम में हल्की ठंडी हवा थी।
डिम लाइट, छोटी-छोटी घास-फूस से बनी हट टाइप के खुले केबिन, जिन पर ऊपर छत तो थी पर साइड से काफी खुला था।
तो ओपन में माहौल काफी खुशनुमा सा लग रहा था।

हमने वहाँ करीब दो घंटे बिताए।
उसने बताया कि वो अपने घर और पति को मिस करती है। मुंबई बिल्कुल पसंद नहीं आ रहा था। दूसरा, मराठी भाषा भी नहीं आती थी, तो समस्या हो रही थी।

मेरी वाइफ के ना होने से लगभग रोज ही शाम को हम मिलने लगे।
कई बार मैं कार से भी उसको लेकर गया।
इससे हम दोनों में एक अच्छा रिश्ता बन गया।
और वो काफी खुल भी गई।

सेक्स को छोड़ के सभी तरह की बातें हम करते थे।
इन सब की वजह से मैं अपने व्यापार पर ध्यान नहीं दे पा रहा था और साथ ही साथ चुदाई की गाड़ी भी आगे बढ़ नहीं रही थी।

सो बौखलाहट या झुंझलाहट काफी भरी थी।
कई बार सोचा कि कदम पीछे खींच लूँ।
फिर सोचता—कितने महीनों की मेहनत है ये, फिर क्यों पीछे हटना?

फिर एक वीकेंड मैंने महाबलेश्वर घूमने चलने को कहा।
वो भी झट से राजी हो गई।

मुंबई के पास कई ऐसी जगहें हैं।
सुबह हम लोग कुछ कपड़े लेकर निकले।

आज कविता ने प्लाजो और टाइट कुर्ती पहनी थी।
मैं टाइट कुर्ती में उसके टाइट चूचियों को इमेजिन कर रहा था, सोच रहा था—इसे उतारने में मुश्किल होगी और उसके अंदर उसका गोरा बदन, गोरी-गोरी चूचियाँ कैसी होंगी।

आज उम्मीद थी कि शायद आज मैं इस मस्त औरत को चोद लूँगा।

खैर, हम पहुँचे तो कविता ने पहले ही रूम बुक किया हुआ था।
आखिरकार सरकारी डिपार्टमेंट की बड़ी अधिकारी थी, तो इतनी तो पहुंच उसकी थी कि वो बेस्ट रिसॉर्ट बुक कर सके।

हम दोनों अपने-अपने रूम में फ्रेश हुए और घूमने निकले।
काफी सारे पॉइंट घूमे; साथ में काफी फोटोज भी लिए; काफी क्लोज हो के भी फोटो लिए।

शाम होने को आई पर ऐसा कोई सिग्नल नहीं था कि सम्भोग हो सकता है।

मैंने कई बार ऐसे टॉपिक की शुरुआत की जिससे बात सेक्स जैसे विषय पर कुछ बात हो, पर बात कुछ आगे नहीं बढ़ी।
सुहाना मौसम, साथ में हसीन साथी।

एक अच्छी बात ये हुई कि फोटो लेते वक्त उसने मेरे हाथ को पकड़ा।
उफ्फ! इतने सॉफ्ट हाथ थे वो— मैं सोच भी नहीं सकता था।

एक बार जब काफी क्लोज थे, तो मैंने एक हाथ पीछे ले जाकर उसकी कमर में भी रखा।
जिससे उसको सिहरन सी हुई जो मैंने फील की।
उसने भी फील की होगी।

और इस मौके को मैंने उसे सीड्यूस करने के लिए बार-बार करने लगा।
उसने मना तो नहीं किया, कोई प्रतिरोध नहीं।
वो मेरे स्पर्श का लुत्फ उठाती रही।

मेरा अनुभव और लोगों से मिली जानकारी के अनुसार, पैंतीस-चालीस के बाद शादीशुदा जोड़ों की सम्भोग लाइफ में एक ठहराव आ जाता है और सम्भोग करने के अंतराल में भी कमी आ जाती है।
मैक्सिमम चार सम्भोग ही एक महीने में होते हैं और ये बहुत सामान्य सी बात है।

इंसानी फितरत भी यही है कि दूसरी औरत और दूसरा आदमी ज्यादा उत्तेजक लगता है।

ज्यादातर महिलाएँ या पुरुष अपनी पैंतीस-चालीस की उम्र पर परिवार की जिम्मेदारियों के वजह से अपनी सेक्स लाइफ को स्पॉइल (खराब) कर देते हैं।
और यही वक्त होता है जब आपका साथी बहक जाता है या ऐसा हो सकता है।

कविता भी पिछले कई महीनों से पति और परिवार से दूर थी।
और उसने जिस तरह से अपने जिस्म को संजो के रखा था, उससे उसके जिस्म की आग को समझा जा सकता था।

माना वो एक संस्कारी महिला थी पर उसको प्यार से चोदा भी जा सकता था।
उसका भरोसा, उसकी प्राइवेसी और दिल जीत के चोदा जा सकता है।
और मैं वही कर रहा था।

पूरे दिन में इतना यकीन आ गया था कि मेरी पहल पर कविता हंगामा नहीं करेगी।
शायद थोड़ा प्रतिरोध हो, पर वो उसके संस्कार और लोक-लाज की वजह से होगा, न कि मेरी पहल की वजह से।

दोपहर तक जहाँ उम्मीद नहीं दिख रही थी, वहाँ शाम तक पूरी-पूरी रोशनी दिखने लगी।

कविता सभ्य, शालीन, संस्कारी, पारिवारिक महिला थी।
पर इसका ये मतलब नहीं था कि वो खुल के अपने जीवन को जीना नहीं चाहती थी।

इस उम्र की महिलाओं के साथ होता है— ऐसा नहीं है कि वो जंगली सेक्स की चाह नहीं रखतीं।
ज्यादातर महिलाएँ या पुरुष इसी दौर में बहक जाते हैं।

कुछ ऐसा ही हाल कविता का था।
उसको भी मेरे साथ कुछ नयापन मिला, कुछ आजादी मिली, तो वो मेरे साथ अक्सर समय व्यतीत करने लगी।

और सच बोलूँ तो ये प्यार-व्यार कुछ नहीं था, सिर्फ सेक्सुअल अट्रैक्शन (आकर्षण) था— एक नया पुरुष लाइफ में।

फिर मैंने शाम को उसको वाइन का ऑफर दिया, जो उसने मान भी लिया।
हमने एक बेहतरीन वाइन और कुछ चखना मँगवाया।

साथ में बातें, जोक्स, फिर परिवार और धीरे-धीरे वैवाहिक जीवन पर बात आ गई।
अब ये सब शुरू हुआ कुछ इस तरह से, जो मैं चाह रहा था।

जैसे आप शुरू से जानते थे कि मैंने कविता को सिर्फ चोदने के लिए ही दोस्ती की थी।
मैंने अपने पिछले कई महीने लगाए थे।

मैंने उसको सबसे पहले सर्दियों के मौसम में देखा था।
फिर गर्मियाँ आईं।
फिर बरसात।
और अब बरसात लगभग खत्म सी थी।
तो आप समझ सकते हो कि कितने महीनों की मेहनत का परिणाम शायद मिलेगा।

मेरी फैंटसी उसको चोदने की शायद आज पूरी हो जाएगी।
मैं एक शालीन सभ्य पुरुष का किरदार निभाते-निभाते बोर या कहें उकता चुका था।

मैंने थोड़े कम अश्लील जोक्स के साथ शुरू किया और बात सेक्स लाइफ तक ले गया।
शाम गुजर रही थी।
रात के आने की आहट थी।

थोड़ा वाइन का सुरूर, खुशनुमा सा माहौल।
कविता के साथ एक दूसरा पुरुष और उसका आकर्षण।
जिसके दिमाग में सिर्फ और सिर्फ कविता के नग्न बदन को मसलने का ख्याल था।

बातों-बातों में उसका हाथ पकड़ के सहलाने लगा।
एक बार कविता ने कोशिश की हाथ छुड़ाने की … पर कामयाब नहीं हुई।
मैं उंगली पकड़ चुका था।
मेरे हाथ धीरे-धीरे बाँह तक पहुँच के सहलाने लगे।

इतने सालों का तजुर्बा था कि एक लड़की, औरत की कामाग्नि कैसे जगाई जाए।

डिनर अभी ऑर्डर किया नहीं था। तो तब तक मैं उसको इतना फ्री कर देना चाहता था कि डिनर के बाद भी वो मेरी बाहों में ही रहे।

जिस दौर के हम दोनों थे, उस दौर में सेक्स में इतनी वैरायटी नहीं हुआ करती थी।
न ही जोड़े कुछ ज्यादा ट्राई करते थे।
पोर्न देखना इतना आसान नहीं था।
प्रिंटेड मटेरियल ही ज्यादातर देखे या पढ़े जाते थे।

सिर्फ एक फर्क नहीं है—वो चूत और लंड का मिलन।
तभी भी चूत को लंड की और लंड को चूत की प्यास रहती थी और आज भी रहती है।

मैं उसके और नजदीक आ गया और लगभग सट सा गया।
कविता थोड़ा असहज थी, पर वो दूर नहीं गई।

लगभग साल भर से पति और सम्भोग से दूर थी और अब उसके साथ एक ऐसा पुरुष था जो उसको पसंद था, विश्वास था उस पर।

धीरे-धीरे वो सहज होने लगी।
मैंने चेहरे पर आते बालों को हटाने के बहाने अच्छे से उसके चेहरे पर हाथ फिराया और कान के आसपास, गर्दन तक को सहलाने लगा।
ऐसा हल्का सॉफ्ट सा टच महिला को और लड़की को काफी उत्तेजक लगता है, बदन में उनके सुरसुरी सी दौड़ती है और जिस्म में एक प्यास सी जागने लगती है।

दोस्तो, रोमांस स्टोरी अगले भाग में कविता की चुदाई की सेक्स कहानी को लिखूँगा. प्लीज अपने मेल जरूर भेजें.
rahulsrivas75@gmail.com

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