सेक्स कहानी में मैं कई युवा लड़कियों से सेक्स का मजा ले चुका था. अब मेरी इच्छा थी कि कोई भाभी मिले चोदने को जो मेरी ही उम्र की हो.
पिछले आठ-दस सालों में, या ये कहिए कि उससे भी ज्यादा समय में, मेरी लाइफ में जो भी लड़कियाँ आईं, वो सब 18 से 25 साल की थीं।
ये मेरी उम्र से काफी कम थीं।
कमोबेश सभी एक जैसी ही थीं और उनके तौर-तरीके भी लगभग एक जैसे ही थे।
अब मैं और मेरा दिल किसी हमउम्र औरत के साथ सम्भोग चाहता था।
पर ऐसी महिला के साथ, जो मेरी हमउम्र हो।
मेरी ये फंतासी पूरी नहीं हो पा रही थी।
अब ट्रैवल के दौरान (मैं सेल्स एंड मार्केटिंग में हूँ, तो टूर बहुत करता हूँ), घर के आसपास, राह चलते, लोकल ट्रेन पर, अपने क्लाइंट्स के ऑफिस में, बस स्टॉप पर— हर जगह मेरी आँखें ऐसी औरत को ढूँढतीं, जिसके साथ मैं सम्भोग का मजा ले सकूँ।
कुछ एक अच्छी लगीं, पर हिम्मत नहीं हुई क्योंकि पहली बार मैं खुद एक औरत को ढूँढ रहा था— टाइम-पास सम्भोग पार्टनर के रूप में।
देखा जाए तो अभी तक मुझे किसी को ढूँढने की जरूरत नहीं पड़ी।
सब की सब खुद ही मुझसे टकरा गईं।
अब वो कारण कोई भी हो।
कुछ समय पूर्व मेरी अन्तर्वासना सेक्स कहानी एक स्कूल गर्ल के साथ की प्रकाशित हुई थी। (जिसका लिंक मैं आपको दे रहा हूँ।)
कमसिन कन्या के साथ वन नाईट स्टैंड
इस कहानी में शुरुआत कुछ शायद बोरिंग लगे, पर हम सब को समझना चाहिए कि कोई भी लड़की एक दिन या एक घंटे में नहीं पटती, उसके लिए पापड़ बेलने पड़ते हैं, तब जाकर आप उसकी टाँग खोल के चोद पाते हैं।
इसी फैंटसी के चलते मैंने एक दिन घर के पास के बस स्टॉप पर एक लगभग 40/45 साल की आकर्षक महिला को देखा।
उसका ड्रेसिंग सेंस बहुत अच्छा था।
भरे बदन की बड़ी-बड़ी चूचियाँ, जो सलीके से पल्लू में ढकी हुई थीं।
कार ड्राइव करते वक्त अचानक आदत के मुताबिक मेरी नजर गई और वो मुझे आकर्षक लगी।
मैंने टाइम देखा।
फिर अगले दिन मैं उसी वक्त पर वहाँ से गुजरा।
फिर उसे देखा।
वह आज भी सलीके से साड़ी पहने थी।
इस तरह करीब एक हफ्ते तक मैंने उस पर नजर रखी।
उसका टाइम तो समझ में आ गया।
अब उसका ऑफिस पता करना था।
तो एक दिन मैंने अपनी कार बस स्टॉप से पहले साइड में रोक के खड़ी कर दी और उस पर नजर रखने लगा।
वो लोकल ट्रेन रेलवे स्टेशन की बस पकड़ के स्टेशन पहुँची।
दो-तीन दिन मैंने उसे ऐसे ही फॉलो किया और अंदाजा लगा लिया उसके जाने का समय।
अभी तक उसे नहीं पता था कि कोई उस पर नजर रख रहा है।
हर दिन वो साड़ी में पहले दिन से ज्यादा आकर्षक दिखती थी।
सलीके से बंधी साड़ी में वो सौंदर्य की मूरत लगती थी।
परफेक्ट चूचियाँ, भरा बदन, मोटी जाँघें, सुडौल चूतड़।
इतने दिनों में मैंने उसे आँखों ही आँखों में न जाने कितनी बार चोद चुका था।
एक तरह से मुंबईकर की दिनचर्या रोज एक जैसी ही होती है और उसमें कोई चेंज बहुत ही कम होता है।
तो किसी का पीछा करना, उसके बारे में पता करना काफी आसान होता है।
मैंने भी इसी सुविधा का फायदा उठाने की कोशिश की और उस दिन मैंने उसके ऑफिस का पता कर लिया।
वो एक सरकारी ऑफिस में कार्यरत थी।
अभी तक उसने मुझे नोटिस नहीं किया था।
देखने में वो नॉर्थ की रहने वाली लगती थी।
कुछ इसी तरह मैंने उसके लौटने का रास्ता और घर किस सोसाइटी में है, ये भी पता कर लिया था।
अब मुझे उसे अपने से इंट्रोड्यूस करना था।
ये बड़ा अजीब सा लग रहा था कि इस उम्र में एक औरत का पीछा करना बहुत गलत था।
और इन सब में वक्त भी बहुत खराब हो रहा था।
एक बार तो मैं उसके ऑफिस भी गया। एक चपरासी से पता किया कि वो कहाँ की है, किस पोस्ट पर है, स्वभाव कैसा है।
इस सब में ही महीनों लग गए।
बस उसे चोदने का जुनून सा सवार था।
और सही तरीके से उसे पटाने के लिए जो भी करना पड़े, वो करने को तैयार था।
कहते हैं न, किसी फैंटसी को पूरा करना है तो समय तो देना होगा।
खुद को इंट्रोड्यूस करना ही सबसे बड़ा टास्क था।
कैसे करूँ, समझ में नहीं आ रहा था।
फिर मैंने एक काम किया।
मैंने भी अपने समय में थोड़ा बदलाव किया।
अब मैं उसके साथ ही उसी ट्रेन में सफर शुरू कर दिया।
बस भी वही पकड़नी शुरू की।
एक वक्त के बाद हम दोनों की नजरें टकराने लगीं और मैं उसकी नोटिस में अच्छे से आ गया।
कुछ और समय के बाद नजरें ठहरने भी लगीं।
और शायद उसे अंदाजा भी हो गया कि कुछ गड़बड़ है।
क्योंकि लड़कों की नजर पहचानने में लड़कियों का सिक्स्थ सेंस बहुत काम करता है।
और ये तो एक मैच्योर महिला थी, जिसने ऐसी नजरों को बहुत देखा था।
पर ऐसा होना मेरे लिए सही भी था कि मेरे कुछ काम आसान हो गए।
इन सब में ठंड के बाद गर्मी आई और फिर बरसात का मौसम आ गया।
मुंबई की बारिश एक बार शुरू हुई तो फिर रुकती नहीं है।
इसका असर हर मुंबईकर पर पड़ता है।
पर किसी की दैनिक दिनचर्या नहीं बदलती।
हाँ, रफ्तार थोड़ी कम सी हो जाती है।
बस इंतजार था कि कब बारिश में वो बस का इंतजार करती हुई मिले।
मुझे पता था कि ऐसा मौका मिलेगा जरूर।
और मिला भी।
एक सुबह वो बस का वेट कर रही थी।
उस समय वो अकेली थी।
मैंने उसे दूर से ही नोटिस कर लिया था।
इसलिए थोड़ा आगे जाकर कार रोकी और फिर बैक करके उसे लिफ्ट ऑफर कर दी।
मेरा दिल जोर-जोर से धड़क रहा था।
हाथ-पैर फूल से गए थे।
वो मना कर देती तो मेरा कचरा हो जाता।
बारिश बहुत जोर पर थी।
स्टॉप पर ऑटो भी नहीं था और वो अकेली ही थी।
उसने एक बार टाइम देखा।
फिर कुछ सोचा और मेरा ऑफर मान लिया।
जब मैं स्टेशन पहुँचा तो वो थैंक्स कह के जाने लगी।
मैंने कहा, “मेरा भी ऑफिस का टाइम लगभग ऐसा ही है। बारिश में कार से ही जाता हूँ। अगर बारिश की वजह से आपको लेट हो तो आप फोन करके मुझसे लिफ्ट ले लीजिएगा।”
कह के अपना कार्ड आगे कर दिया।
न जाने क्या सोच के या फिर मेरी किस्मत साथ दे रही थी कि उसने कार्ड ले लिया!
उसके कार्ड लेते ही मैंने कार आगे बढ़ा दी।
क्योंकि मुझे डर था कि मेरे सामने मेरा कार्ड फाड़ के मेरी इज्जत का फालूदा न बना दे।
खैर, ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैं अपनी हिम्मत और किस्मत में अपनी पीठ थपथपा रहा था।
मुझे मालूम था कि फोन जरूर आएगा क्योंकि बारिश के मौसम में कुछ न कुछ होता ही रहता है।
ऐसे समय बीतता रहा।
कोई फोन नहीं आया।
पर इस मुलाकात के बाद एक बदलाव आया।
एक ही समय पर बस-ट्रेन साथ होने पर भी दूर से एक-दूसरे को देखते रहे।
हाँ, अब एक-दूसरे को देख के चेहरे पर मुस्कराहट जरूर आ जाती थी।
इशारों से गुड मॉर्निंग भी होने लगी।
फिर एक दिन लगभग 24 घंटे से बारिश हो रही थी।
अगले 36 घंटे की भी चेतावनी थी।
हाई टाइड का ऑरेंज अलर्ट था।
ट्रेन ट्रैक पर पानी था तो ऑफिस में भी हाफ-डे हो गया।
तभी एक कॉल आई, “हेलो, मैं कविता।”
मैं, “कौन कविता?”
कविता, “वो आपने स्टेशन में कार्ड दिया था।”
मैं, “ओह्ह! सॉरी, मेरे को आपका नाम पता नहीं था।”
कविता, “जी, कोई बात नहीं।”
मैं, “बोलिए आप, बताइए।”
कविता, “वो दरअसल में बारिश बहुत है। ट्रेन भी शायद बंद है या बहुत लेट है। भीड़ भी बहुत है। और ऑफिस में लोगों की बात सुन के बहुत डर लग रहा है। मेरी पहली बरसात है तो क्या आप मेरे साथ चल सकेंगे?”
मैं, “जी, कोई बात नहीं! आप परेशान मत हो। मैं आता हूँ। बस आप अपनी लोकेशन भेज दीजिएगा।”
ऑफिस के पास पहुँच के फोन किया तो वो भी नीचे आ गई।
मैंने कार ठीक उसके सामने रोक के उसके लिए गेट खोला।
कविता आराम से अंदर बैठ गई।
कविता, “थैंक्स! मेरी वजह से आपको प्रॉब्लम हुई।”
मैं, “जी, ऐसी कोई बात नहीं। मैं भी बस निकल ही रहा था ऑफिस से। आपने सही समय फोन किया, वरना शायद मैं निकल जाता। और अब देखिए, समय से हम लोग घर पहुँच जाएँगे!”
कविता, “ऑफिस में लोग पता नहीं क्या-क्या बात कर रहे थे। मैं डर सी गई। फिर आपका ख्याल आया तो फोन कर दिया।”
मैं, “अच्छा किया फोन कर दिया! वैसे आपको जल्दी इसकी आदत हो जाएगी। यहाँ के लोग बहुत हेल्पफुल हैं।”
उसकी बातों से लगा कि वह काफी बातूनी है।
पर मैं चोरी-चोरी उसकी विशाल चूचियों पर नजर डाल रहा था।
कुछ इस तरह हम दोनों के बीच बातचीत शुरू हो गई।
और फिर अक्सर बात होने लगी।
पर मेरा मकसद तो चुदाई था जिसका कोई रास्ता नजर नहीं आ रहा था।
दोस्तो, सेक्स कहानी के अगले भाग में कविता की चुदाई की सेक्स कहानी को लिखूँगा. प्लीज अपने मेल जरूर भेजें.
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