वर्जिन सेक्स कहानी में मैंने अपनी मकान मालकिन भाभी और उसकी कुंवारी ननद को एक साथ एक बेड पर चोदा. भाभी को मैं पहले भी चोद चुका था.
दोस्तो, मैं आयुष आपको रचना भाभी और उसकी ननद मीनाक्षी की चुदाई की कहानी सुना रहा था.
कहानी के दूसरे भाग
ननद भाभी की वासना जागी
में अब तक आपने पढ़ लिया था कि रचना और मीनाक्षी एक दूसरे के होंठों को चूम चूस रही थीं और मैं चूतियों की तरह खड़ा खड़ा उन दोनों को देख रहा था.
अब आगे वर्जिन सेक्स कहानी:
कुछ देर बाद वे दोनों अलग हुईं और धीरे-धीरे मेरी तरफ आने लगीं.
रचना नीचे झुककर मेरे लंड को मुँह से चूसकर फिर से खड़ा करने की तैयारी में लग गई और मीनाक्षी ने मेरे होंठों को अपनी गिरफ्त में ले लिया.
मैं सोचने लगा कि कहां तो ऐसा लग रहा था कि रचना भी हाथ से निकल जाएगी और कहां अब मीनाक्षी की चूत भी मुझे मिल गई.
हालांकि मीनाक्षी रचना से थोड़ी सांवली थी और उसका बदन भी रचना के मुकाबले कम भरा हुआ था.
पर चूत तो चूत होती है.
लंड को तो जितने ज्यादा से ज्यादा छेद चोदने मिल जाएं, उतने कम हैं.
इस तरह हम तीनों आपस में चिपके हुए बिस्तर पर आ गिरे.
रचना अभी भी मेरे लंड को चूस रही थी और मीनाक्षी ने अपनी चूत को मेरे मुँह के ऊपर रख दिया था जिससे मैं उसकी नर्म और कुंवारी चूत का मर्दन कर रहा था.
मेरे दोनों हाथ उसके स्तनों को मसल रहे थे.
क्योंकि मीनाक्षी कुंवारी थी इसलिए वह ज़्यादा देर इस हमले को बर्दाश्त नहीं कर सकी.
पांच मिनट बाद ही वह ज़ोर ज़ोर से सांस लेती हुई झड़ गई.
उसका पूरा बदन पसीने से भीग गया था.
रचना तुरंत नीचे उतर आई और उसने मीनाक्षी के होंठों को अपने मुँह में भर लिया.
वह अपनी ननद के होंठों को जोर-जोर से चूसने लगी.
कुछ देर बाद जब हम तीनों सामान्य हुए.
तब मीनाक्षी बोली- अब समझ में आया कि क्यों पूरी दुनिया सेक्स के लिए पागल है … और सबको अच्छा सेक्स क्यों चाहिए!
तब रचना बोली- मीनू, ये तो कुछ भी नहीं है. जब असली सेक्स होगा तब देखना, ऐसा लगेगा कि वक्त यहीं रुक जाए और सारी जिंदगी बस सेक्स ही चलता रहे!
ये सुनकर हम तीनों मुस्कुरा दिए.
फिर मीनाक्षी खड़ी हुई और अपना गाउन पहनती हुई बोली- मैं बाहर के दरवाजे बंद करके आती हूँ.
ये बोलकर वह बाहर चली गई.
इधर रचना और मैं एक-दूसरे में गुत्थम-गुत्था हो गए.
हमारे होंठ आपस में भिड़ गए और हाथ एक-दूसरे के बदन को सहलाने लगे थे.
जल्द ही हम दोनों 69 की अवस्था में आ गए और एक-दूसरे को निचोड़ने लगे.
इतने में मीनाक्षी भी दरवाजा बंद करके अन्दर आ गई.
उसने अपना गाउन उतार फेंका और रचना के बदन को चूमने लगी. बीच-बीच में उन दोनों के होंठ आपस में लड़ जाते थे.
फिर कुछ देर बाद रचना ने मेरा लंड छोड़ दिया और अब वह सिर्फ अपनी चूत मुझसे चटवाने लगी.
मैं भी धीरे-धीरे अपनी जीभ से उसकी चुत की मालिश करता रहा.
इधर उसने मेरे लंड को छोड़ा और मीनाक्षी ने झट से मेरे लौड़े को अपने मुँह में भर लिया.
दस मिनट के इस चुसाई के खेल के बाद मैंने मीनाक्षी को अपने नीचे लिटाया और उसकी नर्म चूत पर अपने लंड से पांच-छह बार लप्पड़ मारे, जिससे वह सिहर उठी.
अब मैंने अपना लंड उसकी कुंवारी चूत के ऊपर लगाया और धीरे-धीरे सुपारे से चुत की फांक को रगड़ने लगा.
मीनाक्षी मेरे लंड के गर्म सुपारे की छुअन से पागल होती जा रही थी.
उसकी मदभरी सिसकारियां अब धीरे-धीरे तेज हो रही थीं.
लंड अभी चुत में गया नहीं था.
मैं बस यही सोच रहा था कि जब मेरा मूसल लौड़ा मीनू की कुंवारी चुत को फाड़ कर अन्दर जाएगा, तो उसकी आवाजें पक्के में तेज निकलेंगी.
मैंने रचना की तरफ देखा तो वह भी यही सोच रही थी.
मुझे और रचना को डर था कि कहीं इसकी आवाजें सुनकर अशोक और राधा जी बाहर न आ जाएं.
इसलिए मैंने रचना को इशारा किया और उसने अपने होंठों को मीनाक्षी के होंठों पर रख कर उन्हें अपनी गिरफ्त में ले लिया.
अब मैं अपना लंड उसकी चूत में धीरे-धीरे घुसाने लगा.
लंड मोटा था तो दर्द के कारण मीनाक्षी की आंखें और तड़फ भरी सिसकारियां बढ़ने लगीं.
रचना ने उसके होंठों को कसकर दबोच रखा था, इसलिए उसकी आवाज़ ज़्यादा बाहर नहीं आ पा रही थी.
मैंने रचना की तरफ देखकर इशारा किया.
उसने भी अपना सिर हां में हिला कर जवाब दिया.
उसी पल मैंने एक ज़ोर का झटका लगा दिया.
मेरा लंड मीनाक्षी की कुंवारी चूत को चीरता हुआ अन्दर घुस गया.
मीनाक्षी की सिसकारी चीख में बदल गई, बेडशीट पर खू.न के छींटें आने लगे.
मीनाक्षी के हाथ-पैर चलने लगे और वह अपने आप को हम दोनों की गिरफ्त से छुड़ाने की नाकाम कोशिश करने लगी.
मेरा लंड भी कुंवारी चूत को चोदने के कारण जलने लगा था, पर हम तीनों कुछ देर वैसे ही पड़े रहे.
थोड़ी देर बाद जब मीनाक्षी नॉर्मल हुई.
तब रचना ने उसके मुँह को छोड़ा और उसके रसभरे मम्मों को मसलने लगी.
साथ ही मैंने भी अपनी कमर धीरे-धीरे चलाना शुरू कर दिया.
पर मीनाक्षी की चूत एकदम कसी हुई थी.
इसी कारण से रगड़ बहुत ज़्यादा हो रही थी.
जब लंड चूत से बाहर निकलता था तो उसके साथ-साथ मीनाक्षी की चूत के अन्दर का मांस भी बाहर खिंचा चला आता था.
फिर कुछ देर तक धीरे-धीरे चुदाई चलती रही.
मीनाक्षी का दर्द हल्का-हल्का कम होने लगा था और उसे मजा आने लगा था.
उसकी चूत भी अब हल्की-हल्की गीली होने लगी और चुदाई अब आसानी से होने लगी.
मैंने भी धीरे-धीरे अपनी स्पीड बढ़ा दी.
हम दोनों की मादक सिसकारियां उस कमरे में गूंजने लगीं.
रचना कभी उसके दूध चूसती, कभी उसके होंठ चूसती और कभी मेरे होंठ चूसने लगती.
हम तीनों वासना के समंदर में गोते लगा रहे थे.
इतने में मीनाक्षी की सांसें बढ़ने लगीं और वह ऊपर उठकर मेरे सीने से चिपक गई.
उसके मांसल स्तन मेरी छाती में दब गए और उसके नाखून मेरे पीठ पर चलने लगे.
किसी जंगली बिल्ली की तरह उसने पहले मेरे होंठों को चबाना शुरू कर दिया था.
साथ ही वह अपने नाखूनों से मेरे पीठ पर निशान बनाने लगी और खुद ही मेरे लंड के ऊपर अपनी कमर से दबाव बनाने लगी.
जल्द ही वह स्खलित होने लगी और मुझे पूरी ताकत से दबोचती हुई निढाल पड़ गई.
उसने इस तरह मेरे होठों और पीठ पर अपनी कुंवारी चुत के भंग होने के निशान छोड़ दिए थे कि क्या ही लिखूँ.
चूंकि मीनाक्षी की पहली बार चुदाई हुई थी इसलिए वह बहुत जल्द ही झड़ गई थी.
शायद हम दोनों चार-पांच मिनट ही चुदाई का मजा ले पाए थे.
वह एकदम जिंदा लाश की तरह बिस्तर पर पसर गई थी और अपनी दहकती सांसों को काबू करने लगी.
इधर रचना भी जल-बिन मछली की तरह तड़प रही थी और मुझे भी चूत चाहिए थी.
मैंने लंड मीनाक्षी की फटी हुई बुर से बाहर खींच लिया था और उसे हाथ से मुठिया रहा था.
रचना मेरे लवड़े को देख कर फटाफट मेरे पास आ गई और मैंने उसे अपने नीचे ले लिया.
इतनी देर से फोरप्ले होने के कारण उसकी चूत काफी गीली थी.
मैंने आराम से निशाना लगाया और रचना की गुलाबी चूत में अपना फनफनाता हथियार धीरे-धीरे अन्दर घुसाने लगा.
जैसे-जैसे लंड अन्दर जा रहा था, वैसे-वैसे रचना की आंखें बंद होती जा रही थीं और उसकी कामुक सिसकारियों की आवाज़ बढ़ती जा रही थी.
रचना के साथ चुदाई करते मुझे छह महीने हो चुके थे.
इस वजह से हम दोनों को एक-दूसरे की आदत हो चुकी थी.
इसलिए जल्द ही हम दोनों एक-दूसरे में समा गए और हम दोनों ने मिलकर वासना का नंगा नाच शुरू कर दिया.
मैं उसके ऊपर चढ़ा हुआ चुदाई कर रहा था.
कुछ देर बाद उसने इशारा किया तो मैंने उसे उठाकर अपनी जांघों में बैठा लिया.
अब उसके दूध मेरे सीने में रगड़ खाने लगे और हमारे होंठ आपस में मिल गए.
अब वह खुद उछल-उछल कर चुदाई का आनन्द लेने लगी.
तकरीबन दस मिनट की चुदाई के बाद मैंने उसे उल्टा कर दिया और डॉगी पोजीशन में आने को बोला.
वह झट से पलट गई और फड़फड़ाता लंड उसकी चूत की गहराई नापने लगा.
अब तक उसकी चूत भी काफी खुल चुकी थी और बड़ी आसानी से लंड उसकी चुत में अन्दर आ जा रहा था.
वर्जिन सेक्स का मजा लेते हुए मैंने अपने धक्कों की स्पीड बढ़ा दी.
जिससे उसकी मादक सिसकारियां ज़ोर-ज़ोर से पूरे कमरे में गूंजने लगीं.
इधर मीनाक्षी अब काफी आराम से उसी बिस्तर पर पड़ी हुई थी और बिल्कुल शांति से धीरे-धीरे अपने स्तनों को सहला रही थी.
जब हमारी आंखें मिलीं तो मैंने उसे अपने साथ मज़ा लेने के लिए कहा.
पर उसने मना कर दिया.
वह बोली- मेरी चूत अभी तक दुख रही है, मेरे लिए आज इतना ही काफी है. तुम भाभी के साथ मज़े करो.
आज उसका पहली बार था इसलिए रचना और मैंने उससे ज़्यादा ज़िद भी नहीं की.
हम दोनों वापस अपनी चुदाई में लग गए.
कुछ देर बाद मैं बिस्तर से उतर कर नीचे खड़ा हो गया.
मैंने रचना को खींचकर किनारे लिटा दिया, उसके पैरों को अपनी कमर में लपेट दिया और फिर से चुदाई का खेल शुरू हो गया.
मेरे दोनों हाथ रचना के स्तनों को मसल रहे थे और लंड चूत की चुदाई किए जा रहा था.
आज ना तो वह … और ना ही मैं जरा भी थकने का नाम ले रहा था.
पांच मिनट बाद उसकी सांसें तेज़ होने लगीं तो मैंने अपने दोनों हाथ उसकी गांड में फंसा कर उसे ऊपर उठा लिया.
फिर बिस्तर से थोड़ा पीछे खड़ा होकर मैं ज़ोर-ज़ोर से रचना की चुदाई करने लगा.
मैं हर झटके के बाद लंड पूरा बाहर निकाल लेता और फिर ज़ोर से अन्दर डालता.
इस तरह की चुदाई से रचना का पूरा बदन हिल रहा था और वह ज़ोर-ज़ोर से उछल रही थी.
सिर्फ़ दो मिनट के बाद उसने मेरे होंठों को अपने मुँह में भर लिया और ज़ोर-ज़ोर से चबाने लगी.
मेरे होंठ जो पहले ही मीनाक्षी के कारण दुख रही थे, अब और ज्यादा दर्द होने लगा.
पर चुदाई के मज़े के आगे जरा सा भी दर्द महसूस नहीं हो रहा था.
होंठों को चबाते हुए रचना ने अपनी कामुक आवाजें अपने कंठ के अन्दर ही रहने दीं और अपनी चुत का पानी निकालने लगी.
उसका शरीर झटके मारने लगा.
उसकी चूत से बहते पानी ने मेरे शरीर की आग को और बढ़ा दिया था.
कुछ ही पलों में मेरे अन्दर का लावा भी फूट पड़ा और मेरा वीर्य रचना की चूत में समाता चला गया.
दो-दो चूत की चुदाई के बाद मेरा शरीर पस्त पड़ गया था.
मैं और रचना भी उसी बिस्तर पर पसर गए और मेरा लंड रचना की चूत से बाहर निकल गया.
रचना के अन्दर से मेरा वीर्य और उसका कामरस उसकी चूत से बहकर बिस्तर को भिगोने लगा जिस पर पहले ही मीनाक्षी के कौमार्य भंग होने की निशानी पड़ी थी.
हम दोनों अपनी-अपनी सांसों को नियंत्रित करने में लगे थे.
मीनाक्षी अब तक काफी आराम कर चुकी थी, वह मेरे सीने से चिपक कर अपनी नाज़ुक उंगलियां उस पर फिरा रही थी.
कुछ देर बाद हम तीनों उसी बिस्तर पर नंगे ही सो गए.
रचना ने सुबह चार बजे का अलार्म लगा दिया जिससे मैं वापस अपने कमरे में चला जा सकूँ.
उस रात हम तीनों नंगे चिपक कर सोए थे.
मीनाक्षी की चूत काफी दुख रही थी इसलिए वह दुबारा नहीं चुदी थी.
सुबह जल्दी ही मुझे अपने कमरे में भी जाना था, इस वजह से मैंने खुद ही उस रात और ज्यादा चुदाई नहीं की थी.
दोस्तो, उस घर में मैं चार साल रहा और जब भी मौका मिलता, हम लोग अपनी हवस की आग को बुझा लेते.
मीनाक्षी से मुझे उतना लगाव नहीं था, जितना रचना से.
रचना को आज भी मैं अपना पहला प्यार मानता हूँ … और आज भी जब कभी मुझे वहां जाने का मौका मिलता है, तो हम दोनों चुदाई करते ही हैं.
बाद में मीनाक्षी की शादी भोपाल में हुई.
मैं भोपाल जाता रहता हूँ पर उससे मिलता नहीं हूँ.
जब आखिरी बार उस शहर को छोड़ने वाला था, तब रचना ने खुद मुझसे गर्भवती होने की इच्छा जताई थी और मैंने उसकी ये इच्छा पूरी भी की थी.
मेरा और रचना का एक बेटा भी है.
रचना से आज भी मेरी लगभग हर हफ्ते बात होती है.
वह मेरी शादी में भी आई थी.
उसे मेरी पत्नी रश्मि और मेरे सेक्स के बारे में पता है कि रश्मि मेरा साथ नहीं देती.
मैंने उसे मानसी के बारे में भी बता दिया था.
पहले तो वह गुस्सा हुई पर बाद में समझ गई थी.
इस तरह मैं रचना और उसकी ननद को चोद पाया था.
मुझे उम्मीद है कि आपको मेरी यह सच्ची सेक्स कहानी पसंद आई होगी.
वर्जिन सेक्स कहानी पर आप मुझे मेल व कमेंट्स करके जरूर बताएं.
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