हॉट विडो कहानी में मेरी मॅाम लम्बी हॉट औरत हैं सेक्सी किस्म की. पिता की मौत के बाद मैं उनको अपने साथ शहर ले आया और उनको शहर की हवा लग गयी.
फ्रेंड्स, मेरा नाम विशाल है. मैं एक 26 साल का नौजवान हूँ.
जैसा मेरा नाम वैसा ही मेरा छह फुट दो इंच का लंबा तड़ंगा और अपने नाम के अनुकूल विशाल व गठीला शरीर है.
यहां मैं आपको मॉम सन फक सेक्स कहानी सुना रहा हूँ.
यह एक सच्ची हॉट विडो कहानी है.
मैं उदयपुर में एक डिपार्टमेंटल स्टोर में परचेज ऑफिसर हूँ.
एक महीने पहले मेरे पिताजी का गांव में स्वर्गवास हो गया था.
उनके जाने के बाद मैं मां को अपने साथ उदयपुर ले आया था.
गांव में हमारी अच्छी खासी पैतृक संपत्ति थी, जो हमारे चाचा ताऊओं ने अच्छे दामों में हमसे ले ली थी.
मेरी मां का नाम मधुलिका देवी है.
वे 48 साल की एक लम्बे कद की छरहरे बदन की सुंदर महिला हैं.
मेरी ही तरह मां का शरीर गठा हुआ है और उनका कद करीब पौने छह फुट लम्बा है.
मां का छरहरा बदन होने के अलावा एक सुंदर औरत के शरीर में जहां जहां भराव होने चाहिए, वहां प्रचुर भराव हैं.
गोल फूले गालों वाला चेहरा, छाती पर दो कसे हुए स्तन, फिर नीचे पतली कमर और कमर खत्म होते ही उठे हुए नितंब व कदली जांघों का विस्तार प्रारंभ हो जाता है.
नीचे लम्बी टांगों से उनकी काया को मादक नजरों से देख कर कोई भी मर्द मदमस्त हो जाता है.
मेरी मां पहनने ओढ़ने की बहुत ही ज्यादा शौकीन हैं पर वे गांव की मर्यादा में रहने वाली महिला हैं.
उन्होंने अपने जीवन के पिछले 15 साल पिताजी की देखभाल करते हुए साधारण रूप से गांव के संयुक्त परिवार में बिता दिए.
मां मुझे बचपन से ही बहुत ज्यादा चाहती थीं.
मैं जानता था कि मां बहुत ही बन-ठन के रहने की शौकीन थीं पर गांव के उस वातावरण में वे अपना शौक पूरा नहीं कर पा रही थीं.
हालांकि मां किसी से भी इस बात की शिकायत नहीं करती थीं.
अब मां मेरे पास उदयपुर में आ गई थीं तो मैंने सोच लिया था कि मां के लिए किसी भी चीज की कोई कमी नहीं रखूँगा.
मां गांव में जो शौक पूरे नहीं कर सकीं, उनके वे सारे शौक मैं यहां पूरे करवा दूँगा.
परचेज ऑफिसर होने के कारण मेरे पास महंगे कॉस्मेटिक्स, सेंट्स, अंडर गार्मेंट्स इत्यादि सैंपल के रूप में आते रहते थे.
वे सारे मां को मिल गए और मां धीरे-धीरे उन्हें इस्तेमाल भी करने लगीं.
मां यहां बहुत खुश थीं.
स्टोर के काम के बाद मैं घर पर ही रहता था और हम मां-बेटे में किसी भी विषय पर बहुत खुल कर बात हो जाती थी.
मेरे पास स्कूटर है और संडे या जब भी मौका मिलता है तो मैं मां को स्कूटर पर पीछे बैठा कर उदयपुर की सैर भी कराने लगा था.
इन सब बातों का नतीजा यह हुआ कि मेरा मां के प्रति आकर्षण बढ़ता गया.
अब मैं मां के साथ हंसने-मजाक करने का कोई भी अवसर गंवाता नहीं था.
मैं मां की प्रशंसा करते नहीं थकता था.
मैं उन्हें देख कर कह देता- मां तुम बहुत सुंदर हो!
वे हंस देतीं और मैं कहता जाता- सच में आप सांचे में ढली प्रतिमा जैसी हो मां … तुम जब हंसती हो तो फूल खिल जाते हैं.
इस तरह के शब्दों में मेरे मुँह से उनकी प्रशंसा के लिए यह सब निकलता रहता था.
मां भी मेरे मुँह से ये सब सुन-सुन कर गद्गद् हो उठती थीं.
मैं कभी तो मां के सामने एक छोटा बच्चा बन जाता था और बात-बात में मां को जहां-तहां से पकड़ने लग गया था.
‘मां तुम्हारी हंसी बहुत अच्छी है!’ यह कहकर मैं उनके चिकने गालों को मसल देता था.
मेरी ऐसी हरकतों पर मां हमेशा हंस कर मुझे प्रोत्साहित करती थीं.
मुझे मां के शरीर को छूने में आनन्द आने लगा था.
एक दिन एक नई रोमांटिक पिक्चर लगी और स्टोर में को-वर्कर से उसकी चर्चा सुनी तो मैंने मां से कह दिया.
‘मां इस शनिवार को हम पिक्चर चलेंगे और बाहर ही किसी बढ़िया रेस्टोरेंट में खाना खाएंगे!’
मां को नए-नए कॉस्मेटिक्स, अंडर गार्मेंट्स इस्तेमाल करना और मेरे साथ हंसी-मजाक के माहौल में रहना बहुत रास आ रहा था.
वे पिताजी के साथ अपनी ये इच्छाएं कभी पूरी नहीं कर सकीं, पर यहां अनायास ही सब पूरी हो रही थीं.
उस दिन शनिवार था और मैंने इवनिंग शो में एक मल्टीप्लेक्स में शो की टिकट्स ले ली थीं.
मां नई हल्के रंगीन साड़ी में मेरे साथ पिक्चर देखने बहुत ही मुदित मन से चल पड़ीं.
हॉल में अंधेरा हो गया और रोमांटिक पिक्चर के सीन और गाने एक के बाद एक आने लगे.
उधर हीरो-हीरोइन की छेड़छाड़, दो अर्थी संवाद चल रहे थे, इधर मैं मां का हाथ दबा देता, तो कभी कंधे पर हाथ रख देता … इत्यादि यही सब चल रहा था.
फिर जब पिक्चर खत्म हुई तो हम दोनों बाहर आ गए और हमने एक आलीशान रेस्टोरेंट में डिनर लिया.
उसके बाद रात 11 बजे के करीब घर पहुंच गए.
घर पहुंच कर मां बहुत खुश थीं.
मां बोलीं- विशाल तुम मेरा कितना ख्याल रखते हो. यह पिक्चर देख कर पता चला कि दुनिया कहां पहुंच गई है और मैंने तो अपनी सारी जवानी गांव में यूँ ही गंवा दी!
मां की यह बात सुनते ही मैं तपाक से बोल पड़ा- मां गंवा कहां दी, अभी तो शुरू हुई है!
मां मुस्कराती हुई बोलीं- क्या? मेरा मतलब पिक्चर की हीरोइन के सामने हम लोगों की क्या जिंदगी थी?
मैं- मां, वह हीरोइन तुम्हारे सामने क्या है, वह तो पाउडर और क्रीम में पुती हुई थी. तुम्हारे सामने तो ऐसी हजारों हीरोइन पानी भरती हैं.
मां- अच्छा … तो ऐसा मेरे में क्या देखा है?
मैं- तुमको क्या पता है कि तुम्हारे में क्या है?
ऐसा कहते-कहते मैंने मां के गाल को चिमटी में हल्के से भर लिया और उनसे आंखें मिलाते हुए कहा- कहां तुम्हारा सब कुछ नेचुरल … और उसका सब कुछ बनावटी!
मां- तुम आजकल बातें बड़ी प्यारी-प्यारी करने लगे हो. कहीं कोई लड़की तो नहीं पटाने लगे?
मैं- मां तुम तो जानती हो कि लड़की-वड़की में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है!
मां- लेकिन मेरा तो आजकल तुम बहुत ही ज्यादा ध्यान रख रहे हो!
मैं- पर मां तुम कोई लड़की थोड़े ही हो!
ऐसा कह कर मैंने डबल बेड पर बैठी हुई मां को अपने आगोश में भर लिया और उनके गाल पर हाथ फेरते हुए कहा- मां अगर तुम लड़की होतीं तो मैं तुमको जरूर पटाता … और यदि नहीं पटतीं तो जबरदस्ती भगा कर ले जाता.
‘आजकल मेरा लाड़ला बहुत शरारती हो गया है. शायद वह इस तरह की पिक्चर देख-देख कर सीख रहा है!’
मां ने मेरी बांहों में ही खुद को समर्पित करते हुए मेरे सीने पर सर टिका दिया.
मां मेरी ओर देख कर हंस रही थीं.
कुछ पल बाद मैंने मां को आगोश से मुक्त कर दिया और उनके घने बालों पर हाथ फेरने लगा.
मैं- मां, तुम्हारी ऐसी मुस्कराहट पर तो मैं सब कुछ कुर्बान कर दूँ … जी तो करता है कि एक प्यारी सी पप्पी ले लूँ.
‘तुम मेरा इतना ख्याल रखते हो और इतनी छोटी सी बात के लिए पूछ रहे हो!’ यह कह मां मेरी आंखों में देखती हुई हंसने लगीं.
मैंने जल्दी से मां के गाल पर पुचकार कर एक हल्की सी पप्पी ले ली.
कुछ तो यह सब इतना अचानक हुआ कि मैं झेंप और हड़बड़ी में यह प्रथम चुम्बन कोई यादगार चुम्बन नहीं बना सका.
‘बस, चलो … अब सोने चलें! मां ने कहा और वे उठ खड़ी हुईं.
वे मेरे कमरे के बगल में सटे हुए अपने रूम की ओर चल दीं.
मैं भी फ्रेश होकर अपने रूम में वापस आ गया.
जिस बेड पर अभी मां के साथ यह सब चल रहा था … मैं उसी बेड पर पड़ गया.
बेड पर पड़ा-पड़ा काफी देर मां के बारे में ही सोचता रहा और न जाने कब नींद आ गई.
दूसरा दिन रविवार का था.
नींद तो सुबह रोज वाले समय पर ही खुल गई, पर मैं बिस्तर पर ही पड़ा रहा.
अभी सुबह के समय दिमाग पूरा फ्रेश था.
अचानक दिमाग में मां आ गईं.
पर यह बदली हुई मां की कल्पना थी.
वे उस समय एक पूर्ण नारी थीं जो सौंदर्य की प्रतिमा थीं.
मदमस्त यौवन की उफनती हुई नदी नजर आ रही थीं.
गांव में मां का मनचाहा वातावरण नहीं था; यहां मनचाहा वातावरण मिलते ही मां फूल की तरह खिल गईं.
इस फूल की मीठी सुवास लेने के लिए मैं बेचैन हो उठा.
उसी वक्त मां के खुलेपन ने आग में घी का काम किया.
सुबह 11 बजे तक मैं रेडी हो गया.
मां ने मेरी बहुत ही ज्यादा पसंद का नाश्ता अपनी मदहोश कर देने वाली अदाओं का तड़का लगा कर पेश किया.
नाश्ता खत्म होते ही कॉल बेल बजी और दरवाजा खोला तो एक सप्लायर नए सैंपल के साथ मौजूद था.
कुछ देर तक मैंने उससे बातें की और वह सैंपल घर पर छोड़ कर चला गया.
अब सोफे पर मां आकर बैठ गईं.
मां के सामने ही मैंने सैंपल का पैकेट खोला.
उसमें फुल साइज की एकदम मॉडर्न ब्रा और पैंटीज थीं.
अब मैं मां से ज्यादा से ज्यादा खुलना चाहता था और उनके मन की थाह लेना चाहता था.
‘लो आज तो दिन उगते ही हीरोइनों वाला तोहफा भी आ गया!’ मैंने मां के आगे एक ब्रा को झुलाते हुए कहा.
मां- तो अब तुम अपनी मां को ये सब पहनाओगे क्या?
‘इतने खुशकिस्मत हम कहां!’ मैंने आहें भरते हुए कहा.
मां ने मेरे गाल पर चिकोटी काट ली.
तभी कॉल बेल बजी, मां ने ब्रा-पैंटी जल्दी से पैकेट में डाल दिए.
मैंने दरवाजा खोला तो सामने कामवाली बाई थी.
मुझे भी बाहर कुछ सप्लायर्स और एजेंट्स के पास जाना था.
मैंने मां से कह दिया कि शाम 6 बजे तक वापस आऊंगा और कहीं बाहर चलेंगे और खाना भी बाहर ही खाएंगे.
शाम ठीक 6 बजे मैं घर पहुंच गया.
मेरी मां आज मॉडर्न मम्मी बनी हुई थीं.
मैंने भी जल्दी-जल्दी हाथ मुँह धो लिए और मां को लेकर शहर से कुछ बाहर ऐसे पार्क की तरफ चल पड़ा, जहां जोड़े मौज-मस्ती के लिए आया करते थे.
पार्क में पहुंचते-पहुंचते 7 बज गए थे.
अंधेरा हो चुका था.
पार्क के बाहर आलीशान चाटवाले, कुल्फीवाले मौजूद थे.
मैंने मां को बताया कि यहां उदयपुर की सबसे अच्छी चाट और आइसक्रीम मिलती है.
फिर हम पार्क में चले गए.
संडे की वजह से पार्क में काफी भीड़ थी.
लोग-बाग एक दूसरे से मस्ती कर रहे थे और फव्वारों का आनन्द ले रहे थे.
बहुत से नौजवान जोड़े भी थे जो अपने साथी का हाथ पकड़े एकांत के लिए झाड़-झुरमुट की तरफ जा रहे थे.
मां सहज थीं.
इसी प्रकार एक घंटा बीत गया.
पगडंडियों की ओर जानेवाले जोड़ों की तादाद बढ़ गई थी.
हम भी पगडंडियों की ओर बढ़ गए.
पगडंडी-पगडंडी हम पार्क का चक्कर काटने लगे.
इस बीच हमने अनेक जोड़ों की कहीं झाड़ियों से आती फुसफुसाहट सुनी, तो कुछेक छिपते जोड़ों पर भी नजर पड़ी.
एक जगह काफी अंधेरा और सुनसान था तो मैंने बराबर में चलती मां के भरे नितंबों पर एक हाथ रख दिया.
मां वैसे ही सहज होकर चलती रहीं.
कुछ देर घूम कर हम पार्क से बाहर आ गए.
बाहर आकर मैंने मां के साथ गोलगप्पे, चाट और आइसक्रीम का आनन्द लिया.
फिर हम दोनों ने बहुत ही महक वाला एक-एक पान खाया.
आज भी घर पहुंचते-पहुंचते 10 बज गए.
पार्क से लेकर घर पहुंचने तक मां बहुत ही खुश थीं और उन्होंने हर चीज का पूरा मजा लिया.
घर में मैं अपने कमरे में मां के साथ आ गया.
मां बेड पर बैठ गईं.
मैंने खड़े-खड़े मां के कंधों पर दोनों हाथ रखते हुए पूछा- कैसा लगा?
मां- तुम तो मेरा इतना ख्याल रखते हो जितना एक पति भी नहीं रखता होगा!
‘मां, मैं तुम्हें हर वह सुख दूँगा जो आज तक तुझे इतनी सेवा करके भी नहीं मिला. अब से मेरा केवल एक ही उद्देश्य है कि तुझे दुनिया का हर वह सुख दूँ जो तुम जैसी सुंदर और जवान नारी को मिलना ही चाहिए!’
मैंने पासा फेंक दिया और मन ही मन भगवान से मनाने लगा कि पासा सही पड़े.
मां- मैं तो निहाल हो गई. जब उम्र थी तो ये सब मिला नहीं!
मैं मां के पीछे बेड पर बैठ गया और मां को अपनी बांहों के आगोश में ले लिया.
मां की पीठ को मैं अपनी छाती से दबाते बोला- मां, तुम्हें देखकर कोई भी तुम्हें 35 से ज्यादा की नहीं बताएगा, फिर मन की तो तुम इतनी जवान हो कि कुंवारी लड़कियों को भी मात देती हो. पिछले 15 साल से बीमार पिताजी की सेवा करते-करते तुम्हारी सोच कुछ ऐसी हो गई है लेकिन अब तुम यहां आ गई हो और अपने वे सारे शौक और दबी हुई इच्छाएं खुल कर पूरी करो!
मां- मैं जानती हूँ कि तुम मुझे बहुत खुश देखना चाहते हो. और मैं यहां सचमुच में बहुत खुश हूँ … पर एक विधवा का ज्यादा बन-ठन कर रहना … भला लोग क्या सोचेंगे?
‘मां ये सब गांव की बातें हैं, यहां शहर में इन बातों की कोई परवाह नहीं करता. मुझे ऐसे लोगों की कोई परवाह भी नहीं है. जिस भी चीज से या काम से तुझे खुशी दे सकूँ, वह मेरे लिए सबसे पवित्र और महान है. यह विधवा वाली सोच मन से बिल्कुल निकाल दो. कौन कहता है कि तुम विधवा हो? तुम तो एकदम सधवा हो … अब से तुम बिल्कुल एक सुहागन की तरह बन-ठन कर रहा करो.
मैं मां के गोरे और भरपूर गालों पर हाथ फेरते हुए कह रहा था.
मां ने भी मेरे गाल पर हल्की सी चपत देते हुए कहा- तो अब तू मुझे विधवा से वापस सुहागन बनाएगा!
‘हां बनाऊंगा!’
यह कह कर मैंने मां के गाल का चुम्मा ले लिया.
मां मेरी ओर देख कर हंस रही थीं.
मैं मां के हंसते होंठों पर एक उंगली रख कर अपने होंठों पर अपनी जीभ फिराने लगा.
मैंने अपनी ओर से इशारा दे दिया कि मैं तुम्हारे होंठों का रस पान करना चाहता हूँ.
हम मां-बेटे इस प्रकार काफी देर तक बातें करते रहे.
फिर रोज की तरह मां अपने कमरे में सोने के लिए चली गईं.
मैं बिस्तर पर काफी देर पड़े-पड़े सोचता रहा कि मां मेरी कोई भी चीज का थोड़ा सा भी विरोध नहीं करती हैं.
पर मैं मां को पूरी तरह खोल लेना चाहता था कि मां की मस्त जवानी का खुल कर मजा लिया जाए.
मां आधुनिक विचारों की, घूमने-फिरने की, पहनने-ओढ़ने की तथा मौज-मस्ती की शौकीन थीं.
इसलिए मैं कोई भी हड़बड़ी नहीं करना चाहता था.
मैं इंतजार कर रहा था कि जल्द ही यह मस्त फूल टूट कर मेरी गोद में गिरने वाला है.
दोस्तो, यह मॉम सन फक सेक्स कहानी का यह पहला भाग है.
आपको अगले भाग में मैं अपनी सच्ची सेक्स कहानी की उत्तेजना से रूबरू करवाऊंगा.
हॉट विडो कहानी पर बस आप मुझे कमेंट्स करके जरूर बताएं कि आपको कैसा लग रहा है.