हॉट मेच्योर लेडी सेक्सी स्टोरी में 36 साल की लड़की परिवार की जिम्मेदारियों से कुंवारी रह गई. लेकिन उसे भी लंड की कमी सताती थी. वह अपनी चूत में उंगली करके अपनी प्यास शांत करती थी.
नमस्ते पाठको, आशा है कि आप कुशल-मंगल होंगे और सेक्स कहानियों का आनन्द उठा रहे होंगे.
मैं आपका साथी और लेखक मानस पाटिल एक बार पुनः आपके सामने एक नई सेक्स कहानी के साथ हाजिर हुआ हूँ.
ये हॉट मेच्योर लेडी सेक्सी स्टोरी एक 36 साल की अधेड़ स्त्री मनीषा की है.
वह एक अतिसुंदर महल-ललना है और वक्त से बदली उसकी बदनसीबी उसकी सुंदरता पर एक काला धब्बा बन गई.
कमसिन उम्र में माता-पिता खोने के बाद वह दुःख और जिम्मेदारियों के बोझ तले दब गई.
छोटी बहन निशा को बड़ा करने और उसकी शादी के चक्कर में उसे पता ही नहीं चला कि कब उसकी शादी की उम्र निकल गई.
शादी के बाद निशा भी अपने पति के साथ सिंगापुर चली गई और बेचारी मनीषा फिर से अकेली पड़ गई.
दिन तो जैसे-तैसे कट जाते, पर सारी-सारी रात करवटें बदल-बदल कर तड़फती रहती और फिर ना जाने कब देर रात में नींद में डूब जाती.
आपको बता दूँ कि मनीषा आज भी अक्षतयौवना थी.
ना कभी कोई दोस्त, ना कोई यार.
उसकी चूत में आज तक लंड के नाम जैसी लकड़ी भी नहीं घुसी थीं.
उम्र के साथ-साथ गदराया हुआ शरीर 38 इंच के फूले हुए मोहक स्तन, जैसे-तैसे उसके ब्लाउज़ में समा पाते.
रोज़ सुबह मॉर्निंग वॉक की आदत से उसकी कमर आज भी लय में थी.
चर्बीदार पेट और उससे ज़्यादा सुंदर थिरकते हुए चूतड़.
उसकी गोल गदराई गांड की मदमस्त चाल से कई मर्द उस पर अपनी नज़रें गड़ाए बैठे थे.
नौजवान लड़कों से लेकर साठ साल के बूढ़े तक मनीषा की जवानी का भोग लगाने के लिए तड़प रहे थे.
आस-पड़ोस के, दफ्तर में कई मर्दों ने जी-जान से मनीषा को आकर्षित करने की कोशिश की, पर मनीषा ने किसी को अपने पास भटकने नहीं दिया.
उसे पता था कि ये सब सिर्फ उसके तन के प्यासे हैं.
कई रातों के जागरण से मनीषा ने आज छुट्टी ली थी.
संभोग-सुख के लिए व्याकुल, उसे आस थी एक ऐसे नर की जो उसे अपनी भुजाओं में भर ले, नंगी करके चूमे-काटे, मजबूत लिंग से उसकी योनि भेदे और उसकी प्यास बुझाए.
आखिर वह भी एक प्यासी मादा थी, उसकी भी मानसिक और शारीरिक आवश्यकताएं थीं.
पर आज तक उसे ऐसा कोई नहीं मिला जो उसका यह दर्द समझ सके.
दिन भर नींद लेकर शाम के पांच बजे वह उठी.
चाय का आनन्द लेती हुई मनीषा अपनी पसंदीदा पुस्तक पढ़ने लगी.
कामोत्तेजक कथाएं और नंगे चित्र देखकर अपनी चूत की भगनासा को वह जोर-जोर से मसलती.
उन कथाओं में अपनी कल्पना करते हुए उसकी वासना का जोर इतना बढ़ जाता कि कुछ ही पलों में उसका योनिरस छलक कर बाहर आ जाता.
उस दिन मनोरंजक सेक्स कथाएं पढ़ते-पढ़ते उसका पल्लू नीचे ढल चुका था.
उभरे हुए सीने आधे नंगे थे. उत्तेजना से धड़धड़ाती छाती ऊपर-नीचे हो रही थी.
घर में तो वह कभी ब्रा-पैंटी नहीं पहनती … अपना यौवन ढकने के लिए बस एक साया, चोलीनुमा छोटा सा ब्लाउज़ और उस पर ढीली साड़ी.
अचानक मेघ भर आए.
वर्षा ऋतु प्रारंभ होने के दिन थे, जिस कारण वायु की गति भी तेज़ थी.
मंत्रमुग्ध कर देने वाले ऐसे वातावरण में चलती ठंडी वायु की तरंगों से मनीषा के शरीर की आग बढ़ने लगी.
वह उठकर छत की तरफ बढ़ी.
शीतल वायु उसकी जलती वासना की चिंगारी को भड़काने लगी.
उस रोमांचित वातावरण से उसकी आंखें बंद होने लगीं.
तेज़ वायु से उसका पल्लू भी नीचे गिर गया.
चोलीनुमा ब्लाउज से बाहर आने को तड़पते स्तनों पर चलती हवा से पता नहीं कब उसका हाथ उसकी साड़ी में घुस गया.
पल्लू को संभालती हुई वह योनिरस से भीगी अपनी चूत को सहलाने लगी.
वर्षा की बारीक बूंदों से मनीषा की कामेच्छा और भड़कने लगी.
तपते-जलते शरीर पर गिरती वर्षा की बूंदें भाप बनकर लुप्त होने लगीं.
मनीषा सिसकने लगी … अब तो अपनी भड़कती कामेच्छा पर संयम रखना उसके लिए कठिन था.
हॉट मेच्योर लेडी अपनी सुध-बुध खोकर अपनी साड़ी उठाकर खड़ी हुई.
मनीषा ने अपनी योनि की पंखुड़ियां फैलाईं और भगनासा को मलने लगी.
‘आअहह … उफ्फ फ्फ … हम्म्म् …’ कराहती हुई मनीषा योनि को मसलती जा रही थी.
पल्लू फिर उसके पैर चूमने लगा.
पैरों पर पल्लू के स्पर्श से उसे स्मरण हुआ कि वह कहां खड़ी है.
भयभीत होकर वह आजू-बाजू देखने लगी.
उसका डरना स्वाभाविक था क्योंकि किसी ने उसे इस अवस्था में देख लिया होता तो वह उसके लिए बहुत ही लज्जास्पद होता.
इतने सालों में उसने खुद को ऐसे संभाल कर रखा था कि किसी को उसके स्तनों की खाई भी दिखाई न दे.
अपने यौवन का खजाना उसने बहुत संभाल कर रखा था.
शीघ्र ही पल्लू से अपने स्तन छुपाए, साड़ी को ठीक करती हुई अपने शयनकक्ष की तरफ दौड़ी.
हॉट मेच्योर सेक्सी लेडी सामने दर्पण में अपनी छवि देखने लगी. यौवन रस से रिसता मादक शरीर और लाल आंखें देखकर वह बड़बड़ाई ‘आ जाओ पतिदेव … मनीषा प्रतीक्षा कर-कर थक गईईई.’
आंखें बंद कर वह स्तनों को आटे की तरह गूँथने लगी.
एक इंच तक फूले स्तनाग्र उंगलियों से निचोड़ने लगी.
चोली के ऊपर से अपना एक स्तन बाहर निकाला, स्तनाग्र को खींच-मरोड़-मरोड़ कर सीत्कारने लगी.
नंगे स्तन को अपने थूक से भिगोते हुए उसने दूसरा स्तन भी उसी निष्ठुरता से दबाना शुरू कर दिया.
चारपाई पर लदे नर्म गद्दे पर लेटती हुई वह अपने स्तनों पर अपनी गर्मी निकालने लगी.
उस क्रूरता के निशान स्तनों पर उभरने लगे. साड़ी ऊपर खींचकर उसने जांघें नंगी कीं और नाखूनों से खरोंचने लगी.
संभोग-सुख से वंचित मनीषा क्रंदन से फड़फड़ाने लगी.
स्तनों की सूजन से लगा कि कहीं ये अभी फूटकर दूध की नदी न बहा दें.
नंगी योनि को मुट्ठी में दबोचती हुई वह गिड़गिड़ाने लगी- आआआ … जाआआ मेरे राजा … चोद मुझे, चढ़ जा इस मादा पर … उफ्फ फ्फ … मेरीईई चूत!
कुछ पल बाद निराश होकर उसने अपनी चोली उतार फेंकी.
यौवनरस से भरा अपना शरीर दर्पण में देखने लगी.
ऐसे तन का दीदार, जिसे किसी मर्द का प्यार ही नसीब न हुआ था.
हर मादा को एक ऐसे नर की आवश्यकता होती है, जो उसकी वासना मिटा दे, शरीर को नोंचकर यौवन का आनन्द ले. पुरुष के लिंग से मादा की तपती-प्यासी योनि को शांत करे. उसके शरीर का एक-एक भाग ऐसे नोचे-मरोड़े कि मादा उसके प्यार से भावविभोर हो जाए.
तभी बिल्डिंग की पार्किंग में से किसी के चिल्लाने और रोने की आवाज़ों से उसका ध्यान टूटा.
अपनी चोली पहन कर उसने अपना मोबाइल देखा तो साढ़े पांच बज चुके थे.
वासना की आग से शुष्क हुए गले की अग्नि मिटाने के लिए उसने मेज़ पर रखे पानी को ग्रहण किया.
उन आवाज़ों से चिंतित होकर उसने साड़ी पलट ली. आवाज़ों से उसे अंदाज़ा हो चुका था कि कोई वयस्क व्यक्ति किसी अपने से कम उम्र वाले पर चिल्ला रहा था.
लिफ्ट की प्रतीक्षा किए बिना उसने सीढ़ियां अपना मार्ग चुना और उन आवाज़ों की तरफ चल पड़ी.
दूसरी मंज़िल के मकान से पार्किंग में आते ही उसने देखा कि उसी बिल्डिंग का दूबे लाठी पकड़ कर खड़ा है.
एक तरुण नीचे बैठे जोर-जोर से रो रहा था और दूबे उस लाठी से तरुण की पिटाई कर रहा था.
एक निरपराध होता अन्याय देखकर वह क्रोध से लाल हो गई.
पल्लू को कमर पर दबाती हुई वह उसकी तरफ भागी.
दूबे के हाथ से लाठी छीनती हुई वह बोली- हरामखोर, क्यों मार रहा है बेचारे को? हे भगवान, देख कितनी चोट लगी है इसे?
दूबे भी आवेश में आकर बोला- बीच में मत आओ मैडम, ये हरामी गाड़ी नहीं धो रहा और ऊपर से पैसे मांग रहा है!
दूबे की क्रूरता और गालियां सुनकर मनीषा अपना नियंत्रण खो बैठी.
लड़के को सहारा देकर उसने अलग किया और दूबे के गालों पर एक जोरदार तमाचा पेल दिया.
थप्पड़ का जोर इतना था कि दूबे ज़मीन पर जा गिरा.
चेतावनी देती हुई वह बोली- चुपचाप निकल ले कुत्ते … वरना पुलिस बुलाकर अन्दर करवा दूँगी. तू जानता नहीं मुझे हरामज़ादे!
सहमाया हुआ लड़का कोने में बैठकर रो रहा था.
अपना क्रोध शांत करके वह उसके पास गई और बोली- अरे उठो रोते नहीं ऐसे … क्या नाम है तुम्हारा?
लड़का डरते हुए बोला- बालू नाम है मेरा मैडम जी … गाड़ियां धोने का काम है जी. ये साहब कभी पैसे ही नहीं देते.
मनीषा ने फिर प्यार से पूछा- मार क्यों रहा था वह हरामज़ादा तुमको?
भड़ास निकालते हुए लड़का बोला- मैडमजी, ये पैसे तो देते नहीं और मुफ्त में गाड़ी धुलवाते हैं … ये तो हमसे ज़्यादा गरीब है जी!
मनीषा ने प्यार से बालों को सहलाते हुए कहा- छोड़ो अब … देखो कितनी चोट लगी है … चलो घर, कुछ दवाई लगा देती हूँ.
मनीषा उस लड़के को अपने घर ले आई, पानी पिलाया और प्यार से उसके घावों पर मलहम भी लगाया.
बालू मनीषा के प्रेमल व्यवहार से भावुक हो गया.
सिगरेट जलाते हुए मनीषा ने उसकी पूछताछ की- कहां रहते हो? मां-बाप कहां हैं तुम्हारे? और पढ़ाई? कौन-सी क्लास में हो?
प्रश्नों के भड़िमार से वह बोला- रहने दीजिए मैडम … क्या करेंगी इस गरीब के बारे में जानकर?
बालू का संकोच देखकर वह बोली- बता भी दो यार … मैं कौन-सी तुम्हारे घर आने वाली हूँ?
मनीषा के खुले व्यवहार से वह बोला- अनाथ हूँ जी … दादी थी, वह भी चार महीने पहले चल बसी. दसवीं तक पढ़ा हूँ मैडमजी.
उसे टोकते हुए मनीषा बोली- क्या उम्र है तुम्हारी?
बालू बोला- जी, 21 साल पूरे हो चुके हैं जी … 22वाँ चल रहा है.
आश्चर्य से उसने पूछा- तुम लगते तो नहीं हो 21 के? इतने से तो दिखते हो?
बालू निराशा से बोला- क्या बताऊं मैडमजी … सच तो मुझे भी नहीं पता, पर लोग कहते हैं मेरी परवरिश ठीक से नहीं हुई और ना ही अच्छा खाना मिला.
बालू के छरहरे तन को देखकर वह बोली- बस दसवीं तक ही? और कोई ढंग का काम तो ढूँढ लेते?
इस पर बालू ने कहा- अरे मैडमजी, पैसे कहां थे? जो भी कमाता, दादी के दवा-दारू में खर्च हो जाते. काम तो मैं भी अच्छा करना चाहता हूँ, पर सब आप जैसे दयालु कहां जी?
बालू की पीड़ा से भरी जिंदगी सुनकर उसे अपने दिन याद आ गए, आंखों से अश्रु की धार गिरने लगी.
माता-पिता के बाद उसका जीवन भी ऐसे ही था … कड़ी मेहनत और परिश्रम से भरा.
उसे अपने बचपन के दिन याद आ गए.
बहन की देखभाल और पढ़ाई के लिए उसने खुद को एक नौकरानी बना लिया था.
बालू की कहानी में उसे अपने गत-जीवन की छवि दिखाई दी और उस पीड़ा-दायक पलों के ख्यालों से उसकी आंखें नम हो गईं.
दोनों की कहानी एक-सी थी.
मनीषा के आंसू देख बालू भी रोने लगा.
बालू को रोता देख मनीषा उसके पास गई, बालू को अपनी बांहों में भर लिया, उसका सिर अपनी छाती पर दबाते हुए प्यार से सहलाने लगी.
उसकी 38 डी नाप की ब्रा में भी न समाने वाली चूचियां बालू के चेहरे पर दब गईं और उस युवा नर के स्पर्श से मनीषा सिहरने लगी.
बालू के श्वसन नलिकाओं से निकलती गर्म भाप से मनीषा के स्तन पुनः फूलने लगे.
बालू के अश्रु से उसकी चोली भीग चुकी थी.
वक्षोपवस्त्र (ब्रा) न होने से उसके स्तनाग्र चोली से साफ दिखाई देने लगे.
मनीषा का पल्लू गिर गया.
बालू के होंठ उस नर्म चूचियों पर टिकते ही उसकी योनि फड़फड़ाने लगी.
बालू में उसे अब वह पुरुष दिखने लगा, जिसके लिए उसने आज तक अपना यौवन बचा कर रखा था.
भावुकता से उसने पूछा- बालू, मुझे अपना लोगे? बनोगे मेरे जीवनसाथी?
उस अकस्मात प्रश्न से बालू हड़बड़ा कर बोला- ये क्या कह रही हैं आप मैडमजी? मैं और आपके साथ? आप तो बहुत बड़ी हैं उम्र में!
पुरुष सहवास के लिए तड़पती मनीषा ने उसका हाथ पकड़ कर अपने स्तनों पर दबाते हुए कहा- ना मत कहना बालू, हम दोनों अकेले हैं दुनिया में … आज से मैं तुम्हारी और तुम सिर्फ मेरे!
बालू भी प्यार का भूखा था.
मनीषा से मिलता प्यार और अपनापन शायद ही उसे कभी नसीब हुआ था.
आगे-पीछे की न सोचते हुए बालू ने भी अपना हाथ मनीषा के स्तनाग्रों पर दबा दिया.
मनीषा प्यासी थी, उसे संभोग-सुख का आनन्द लेना था.
बालू के कठोर हाथों से स्तनाग्रों पर होने वाले स्पर्श से वह थरथरा उठी.
स्तनाग्र मसलने से मनीषा सिहर गई. ‘आअहह … बालूऊ.’ कहकर उसने बालू को आलिंगन में भर लिया.
दोस्तो, इस हॉट मेच्योर लेडी सेक्सी स्टोरी के अगले भाग में मैं आपको बताऊंगा कि किस तरह से मनीषा और बालू के मध्य सेक्स का खेल हुआ और वे दोनों चुदाई की मस्ती में किस तरह से बहने लगे थे.
आप अपने कमेंट्स व मेल जरूर भेजें.
replyman12@gmail.com