महारानी सेक्स कहानी में किसी रियासत की महारानी किसी दूसरे बादशाह की आरामगाह में लंड चुत का घमासान युद्ध लड़कर थककर चूर हो चुकी थी और वह एक स्वप्नलोक में थी.
दोस्तो, यह महारानी सेक्स कहानी कल्पना के आधार पर लिखी गई है.
परंतु इतिहास में ऐसे कामुक किस्से भरे पड़े हैं.
महाराणी प्रियंवदा नंगी अपने बिस्तर पर सोई पड़ी थी.
वह गहरी नींद में थी.
बादशाह सुबह की नमाज़ करने के लिए कब का अपने हरम से निकल चुका था.
सूरज की धूप बिस्तर पर खिड़की से आ रही थी और बिस्तर हल्का गर्म हो चुका था, पर महाराणी पूरे रात चले लंड चुत के घमासान युद्ध को लड़कर थक कर चूर हो चुकी थी और वह एक स्वप्नलोक में थी.
उसे उठाने एक दासी जब कमरे में आई, उस वक्त महाराणी के जिस्म पर एक भी कपड़ा नहीं था.
वह बिस्तर में मुँह दबाये पड़ी थी.
उसकी कमर और कूल्हे ऊपर की ओर उठे हुए थे और रात की कामलीला का परिणाम साफ दिखाई दे रहा था.
उसका और बादशाह का गाढ़ा प्रेमरस ठंडी हवा से उसकी चुत के आस-पास सूख कर चिपक गया था.
दासी महाराणी को इस हाल में देख कर मुस्कुरा उठी. महारानी सेक्स का यह सब नजारा उसके लिए नया नहीं था. वह काफी समय से हरम में थी और न जाने कितनी ही शाही और सुंदर औरतों को इस तरह अपना सब कुछ बादशाह के हाथों लुटाने के बाद बिस्तर में नंगी देख चुकी थी.
वह महाराणी के हुस्न को देख कर बादशाह की चमकती किस्मत के बारे में सोचने लगी.
इतनी सुंदर औरत जिसका बिस्तर गर्म करे, वह तो धरती पर ही जन्नत देख लेता है.
वह पलंग के पास गई और आवाज़ लगाई- महाराणी, अगर नींद पूरी हो गई हो तो आप उठ जाएं, जहांपनाह ने हुक्म दिया है कि आपको आज दरबार में जाना है. पता नहीं क्या बात हो सकती है, पर आप उठ कर तैयार हो जाएं!
इस तरह बहुत ही आराम और नम्रतापूर्वक उस दासी ने महाराणी को उठाना चाहा.
इस दासी का नाम तरन्नुम था, वह खुद एक बेहद खूबसूरत और जवान औरत थी.
दो तीन बार दासी ने जब रानी को उठाने की कोशिश की तो महाराणी की नींद टूटने लगी और वह अपने स्वप्नलोक से वापस असली दुनिया में आने लगी.
महाराणी की आंखें बंद थीं और उसने एक लंबी अंगड़ाई लेते हुए खुद को संभालने की कोशिश की.
फिर आंखें खोल कर पहचानने की कोशिश करने लगी कि वह कहां थी.
धीरे धीरे उसको सब याद आने लगा.
रणकपुर का दुर्ग, महाराजा करण सिंह और फिर वह हमला … और जब वह रनिवास की ओर भागने लगी थी … अपने परिवार के पास उस गुप्त रास्ते की तरफ, तब तक काफी देर हो चुकी थी.
उसे तुर्क सैनिकों ने घेर लिया था और महाराजा करण सिंह ने उन्हें बचाने के लिए तुर्क सैनिकों को काटना शुरू कर दिया था.
पर तुर्क सैनिक जितने मारे जा रहे थे, पता नहीं कहां से और ज्यादा आते जा रहे थे.
मौके की नजाकत को देखते हुए राजा का विश्वासपात्र दुर्जन सिंह तुर्कों से लड़ पड़ा और महाराजा को अपने बेटे और बेटी के साथ गुप्त मार्ग से निकलने का मौका मिल गया.
महाराणी को तुर्क सैनिक वापस महल से बाहर ले गए.
दुर्जन सिंह अपनी स्वामि-भक्ति निभाता हुआ शहीद हो गया.
जब तक किसी के कुछ समझ में आता, राणकपुर के सभी सैनिक मर चुके थे. हर तरफ लाशें पड़ी थीं और महाराणी को सेनापति खुर्द बख्श अपने कंधे पर लटका कर बाहर जा रहा था.
वह पीछे से तुर्क सैनिकों को शाही औरतों के साथ अपमान भरा सुलूक करते हुए देख रही थी और महाराजा करण सिंह अपनी महाराणी को छोड़ कर गुप्त मार्ग से निकल चुके थे.
गुप्त मार्ग अन्दर से बंद किया जा चुका था और तुर्क सैनिक चाहकर भी उसमें नहीं जा सकते थे.
महाराणी को विश्वास था कि जल्दी ही महाराजा करण सिंह एक बड़ी सेना लेकर आएंगे और इन नीच तुर्क लोगों से उसको मुक्त करवा लेंगे.
फिर वह किसी तरह तुर्कों के शिविर में लाई गई और जब पता चला कि वह रणकपुर की महाराणी है, तो उसको बादशाह के सामने नज़र किया गया.
फिर पूरी रात वह खेल चला, जिसमें उसकी चुत का पूरा बाजा बज गया. उसको सब कुछ याद आ गया था.
महाराणी ने अपनी आंखें मसलते हुए दासी को अपने सामने खड़ी पाया, जो उसको देख कर मुस्कुरा रही थी.
फिर अचानक से जब महाराणी को होश आया कि वह तो पूरी नंगी पड़ी है, अपने कपड़ों के बगैर … तो उसने जल्द से बिछी हुई चादर को खींच कर अपना तन ढकने का प्रयास किया.
जिस वक्त महाराणी ने अंगड़ाई ली थी तो उस दौरान दासी को रानी के एकदम से फूल गए बूबे और लहर खाते पेट को बड़े ध्यान से देखने का मौका मिल गया था.
वह इस अप्सरा को देख कर मचल उठी, इसका भी कोई कारण हो सकता था.
दासी ने हंसते हुए वापस महाराणी को बादशाह का फरमान सुनाते हुए कह दिया कि आप जल्दी से तैयार हो जाएं और दरबार में चली जाएं.
महाराणी चुपचाप खड़ी हो गई और दासी ने कमरे से बाहर निकलना शुरू कर दिया.
अब रानी प्रियंवदा भी उस चादर को लपेटे लपेटे उसके पीछे पीछे चल दी.
अलग अलग गलियारों से गुजरती हुई दासी महाराणी को शाही गुसलखाने में ले आई.
उसने कहा- आप अन्दर जाकर नहा लीजिए, अन्दर जरूरत का हर सामान रखा है. फिर हम दासियां मिल कर आपको तैयार कर देंगी!
‘हम?’ महाराणी ने चौंकते हुए कहा!
‘जी, अभी आप नहा लीजिए और हम सब मिलकर आपको तैयार कर देंगी … हे हे हे …’
यह कह कर दासी अपनी कमर मटकाती हुई वहां से चल पड़ी.
महाराणी हैरानी से उसको जाते हुए देख रही थीं और कुछ सोचते हुए वह गुसलखाने में घुस गई.
महाराणी एक बड़े से कमरे में बैठी थी, जहां पर उसे वह दासी ले कर आई थी.
यह वह कमरा नहीं था जहां पर महाराणी ने अपनी पिछली रात बादशाह के साथ मजे लूटते हुए बिताई थी.
यह कोई दूसरा कमरा था.
महाराणी एक बड़े से शीशे के सामने बैठी थी और उसका बदन बहुत कम कपड़ों से ढका हुआ था.
दासी तरन्नुम उसके पीछे खड़ी थी और पर वह अकेली नहीं थी, जो महाराणी के नंगे बदन को निहार रही थी.
उसके साथ तीन लड़कियां और भी थीं, वे सब भी हरम में दासियां ही थीं.
रानी ने ध्यान से देखा, वे चारों ही दासियां हिंदुस्तान की तो नहीं लग रही थीं.
निश्चित रूप से ये तुर्क लड़कियां थीं जो बादशाह की सेवा के लिए हमेशा उसके हरम में होती थीं.
ये दासियां बादशाह के साथ बिस्तर गर्म नहीं करती थीं पर बादशाह का बिस्तर गर्म करने वालियों को तैयार करती थीं.
इस वक्त भी ये सब वही काम कर रही थीं.
वे सब महाराणी को तैयार कर रही थीं.
महाराणी के चेहरे पर तरह तरह की चीजें लगाई जा चुकी थीं और महाराणी के बाल भी संवारे जा चुके थे.
महाराणी के बाल खुले रहते तो लटकते हुए उसकी जांघों तक आते थे.
महाराणी कुछ शर्म और कुछ असहजता की वजह से चुप चुप सी थी.
इतने में ही तरन्नुम बोल पड़ी- महाराणी, आप बहुत ही सुंदर हैं!
यह सुनकर महाराणी सकपका गई और शीशे में से ही देखने लगी कि यह बात किसने बोली है!
पर वह और भी ज्यादा इस बात के बारे में सोच रही थी कि इन तुर्क लड़कियों को हिंदुस्तानी भाषा कैसे आती है!
वह उन चारों को बड़ी गौर से देखने लगी.
वह दासी फिर से बोलने लगी- ओये मेहरू, तू अब जितना चाहे उतना महाराणी के नंगे बदन को देख ले … बस फिर तो उन्हें शाही कपड़े जो बादशाह की पसंद के हैं, वह पहनाने ही हैं.
यह सुनकर वे चारों दासियां बहुत जोर जोर से हंसने लगीं.
महाराणी यह सब सुन और देख कर तो हैरान रह गई.
वह रणकपुर में भी अपनी दासियों के हाथ से ही तैयार की जाती थी.
पर वहां पर उन दासियों की इतनी हिम्मत नहीं थी जो वे महाराणी से ऐसी बात बोल सकें.
महाराणी उन सभी को देखने लगी.
इतने में ही वह दासी जिसका नाम मेहरू था, वह बोली- ऐसी भी कोई बात नहीं है रे, अब तो महाराणी जी को इस हरम में हमारे ही साथ रहना है, अब तो रोज ही रानी के हुस्न को देख कर आंखें सेंकने का मौका मिलेगा. वैसे मुझे समझ में नहीं आ रहा कि कल रात बादशाह को महाराणी ने जन्नत की सैर करवाई या महाराणी को बादशाह ने!
यह बात पूरी होते ही वे चारों फिर जोर से हंस पड़ीं.
महाराणी प्रियंवदा इस बार गुस्से से बोल पड़ी- बेशर्म लड़कियो, तुम्हें क्या बात करने का भी तमीज नहीं है, एक लड़की होकर इस तरह की बातें तुम लोग कर रही हो?
यह बात सुनकर तरन्नुम बोली- महाराणी प्रियंवदा, आप तुर्क बादशाह के हरम में हैं और यहां पर हर काम बेशर्मी से ही होता है. यहां कोई शर्म नहीं रखता, चाहे वह मर्द हो या फिर चाहे औरत.
एक बार फिर से वे चारों हंस पड़ीं.
मेहरू ने कहा- महाराणी, अभी तो आपने बेशर्मी देखी ही कहां है. अभी तो आपको पूरी दुनिया देखनी है, हम बेशर्मों की इस तुर्क हरम में क्या क्या होता है, आप सब बातों से रूबरू होंगी.
यह कह कर वह पागलों की तरह जोर जोर से हंसने लगी.
महाराणी कुछ बोलने ही वाली थी कि कमरे का दरवाजा किसी ने खटखटाया.
तरन्नुम ने आवाज लगाई कि कौन है?
तो बाहर से एक मर्द की आवाज आई- अगर तुम रंडियों ने महाराणी को तैयार कर दिया है तो जल्दी उन्हें लेकर दरबार में चली आओ वर्ना जहांपनाह तुम्हारी गांड में हाथी का लंड घुसेड़वा कर फड़वा देंगे!
यह सुन कर महाराणी सोचने लगीं कि यह कौन है, जो इस तरह गालियां देकर बात कर रहा है.
अगले ही पल वे यह भी सोचने लगीं कि बादशाह ने मुझे दरबार में क्यों बुलाया है?
इतने में ही उसको मेहरू की जोर की आवाज सुनाई दी- अबे ओये भड़वे, तू अपनी जुबान संभाल वर्ना हम तेरा लंड कटवा कर पीछे बहती नदी में बहा देंगी!
वह फिर से हंसी जोर जोर से.
इस पर वह आदमी जो बाहर खड़ा था, जो एक सेवक था … वह बोला- तुम मेरे लंड की चिंता मत करो, अपनी भोसड़ी को संभालो और जल्दी से महाराणी को दरबार में ले आओ!
फिर वह चला गया.
अब वे चारों जल्दी जल्दी महाराणी को तैयार कर रही थीं.
महाराणी ने जो वस्त्र अपने सामने पड़े देखे थे, वे वैसे नहीं थे, जैसे वह आज तक पहनती आई थी.
उन चारों ने बड़ी जल्दी महाराणी को इन नए कपड़ों में तैयार कर दिया था.
जब वे सब अपने काम से फारिग हुईं तो उनमें से किसी के मुँह से निकल पड़ा- माशाअल्लाह क्या माल तैयार किया है हमने!
यह सुनकर महाराणी ने फिर से बड़े ध्यान से अपने आपको शीशे में देखा और वह हैरान रह गई.
वह खुद को पहचान ही नहीं पा रही थी.
घुटनों तक आता उसका कुर्ता जो बेहद चमकीला था और उसमें हीरों और अन्य कीमती रत्नों का बड़ा बारीक काम किया गया था.
उसकी बाजू और चूचों को ढकने के लिए अलग अलग रंग के कपड़ों को काम में लाया गया था.
नीचे की मखमली सी सलवार उसके पैरों में बड़े भींच भींच कर फंसाई गई लग रही थी.
पीछे से उसके कूल्हे उन शाही कपड़ों को फाड़ते से लग रहे थे.
इस सलवार में से महाराणी के कूल्हे कुछ बाहर झांकते हुए से लग रहे थे.
उसके गले और सिर पर एक गुलाबी रेशमी, पारदर्शी चुनरी ओढ़ाई गई थी.
चुनरी के नीचे उसका चेहरा किसी भी मर्द को पागल बनाने के लिए काफी था.
महाराणी का शृंगार किया जा चुका था और उसकी साज सज्जा को देख कर कोई भी कह सकता था कि ये चारों लड़कियां अपने काम में माहिर हैं.
महाराणी अपना यह रूप देख कर एक पल को चहक उठी थी.
उसके लबों पर मुस्कान आ गई थी.
वह खुद को ही बड़े प्यार से आईने में देख रही थी.
इतने में मेहरू बोली- हम्म तो महाराणी जी, बादशाह के दरबार में चलने के लिए तैयार हो जाइए!
महाराणी पीछे मुड़ कर उनको देखने लगी.
दोस्तो, महारानी सेक्स कहानी कैसी लग रही है?
प्लीज कमेंट्स में जरूर बताएं.
आगे और भी मजा आने वाला है.