नामर्द पति और मेरी सुहागरात की दबी हुई इच्छाएं

Views: 273 Category: Group Sex By rahulenters8 Published: May 19, 2026 📖 13 min read
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फॅमिली फक स्टोरी में मेरी सुहागरात पर मैं पति से मिलन का, तन से तन के मिलन का इन्तजार कर रही थी. वो आये और मेरी सुंदरता की तारीफ़ की. उसके बाद …

मेरा नाम वर्षा है।

ये फॅमिली फक स्टोरी मेरी सुहागरात से शुरू होती है।
वह पहली रात, जिसके लिए मैंने कितने सालों से अपनी वासना को दबाए रखा ताकि मेरा पति उसे तृप्त कर सके, लेकिन मेरे सारे अरमानों पर पानी फिर गया।

सुहागरात की रात जब मेरे मन में मिलन के सपने चल रहे थे और मैं बस चुपचाप बैठे पति का इंतज़ार कर रही थी.
तभी एक आहट हुई।
कमरे का दरवाजा खुला और पति कमरे में आ गए।

मैं थोड़ा शर्माती हुई उनको देख के मुस्कुराई।

उन्होंने मेरा चेहरा हाथ में लिया और कहा, “तुम बहुत सुंदर हो!”

और वे चुपचाप आकर बिस्तर पर मुँह दूसरी ओर करके लेट गए।
मुझे कुछ समझ नहीं आया क्योंकि मैं सुंदर और सेक्सी हूँ, फिर भी उन्होंने मुझे किस तक नहीं किया!
और आज तो सुहागरात है; हो सकता है वे काफी थके हुए होंगे और रात भी ज्यादा हो गई थी।

मैंने भी कुछ नहीं कहा और उनको पीछे से बाहें डालकर लेट गई।
मुझे तो बदन में बहुत प्यास लगी थी, इसलिए मेरे हाथ उनकी छाती पर चलते-चलते उनके पजामे के ऊपर आ गए।

मुझे मन में लंबे-तगड़े लंड की तलाश थी जो पूरी होने ही वाली थी लेकिन जब पाया कि लंड जैसा कुछ नहीं है वहां!
तभी उन्होंने मेरा हाथ हटा दिया और कहा, “सो जाओ!”

मैं चुपचाप लेटी रही और सोचती रही कि क्या मेरी किस्मत में ऐसा पति मिला है जो मेरी वासना की तृप्ति नहीं कर सकता?
लगभग एक घंटा बीत गया पर मुझे नींद नहीं आ रही थी और मेरे पति खर्राटे मार कर सो गए थे।

मैं हिम्मत करके उठी और धीरे-धीरे पति की पजामी थोड़ी नीचे सरकाई।
फिर उनकी अंडरवीयर को भी नीचे खींचा और देखते ही मेरे होश उड़ गए!
एक छोटे से बच्चों जैसी नूनी लटक रही थी।

मन में विचार आया कि हाय राम, मेरा पति नामर्द है!
अब क्या होगा मेरा?
मुझे बहुत रोना आया और मैं मुँह दूसरी तरफ करके लेट गई।

सुबह पति उठे और उन्होंने अपनी पजामी को आधा उतरा हुआ पाया तो वह समझ गए कि मैंने उनका राज जान लिया है।

उन्होंने मुझे प्यार से उठाने की कोशिश की.
लेकिन मैंने कहा, “छोड़ो मुझे! आप मेरे किसी काम के नहीं रहे!”

उन्होंने कहा, “तू मेरी पत्नी है और तुझे वह सब सुख मिलेगा, बस मुझ पर विश्वास करो!”

मुझे कुछ समझ नहीं आया, लेकिन मैं और क्या करती?
उठ कर तैयार हो गई और मुरझाई हुई सी अपने सास-ससुर और भैया-भाभी के लिए नाश्ता बनाने लगी।

जब हम सब नाश्ता कर रहे थे, तभी पतिदेव बोले, “वर्षा तुम उदास मत हो, हम सब हैं न तुम्हारे साथ!”
और सभी मुझे देख मुस्कुराने लगे।

मुझे कुछ समझ नहीं आया और मैं अपने कमरे में चली गई।

तभी कमरे में ससुर जी आ गए और कहा, “बेटी, हमसे कोई भूल हो गई तो हमें माफ कर देना!”

मैं मन खोल कर रोने लगी।
उनसे कैसे कहूँ कि आपका बेटा नामर्द है, पापा!

ससुर जी ने अपनी उंगलियों से मेरे आँसू पोंछे और कहा, “तुम्हें ऐतराज न हो तो हम सब तुम्हें इतना प्यार देंगे कि तुम सब दुख भुला दोगी!”

इतने में सभी लोग रूम में आ गए और मेरी नजर भाभी पर पड़ी, जो मुझसे भी ज्यादा सेक्सी थीं।
इतने में सासू माँ ने मेरा चेहरा हाथों से ऊपर को उठाया और कहा, “इतनी सुंदर होकर रोनी सी सूरत बना रखी है मेरी बहू रानी ने!”

मैं सासू माँ के सीने में सिर रखकर रोने लगी।
सासू माँ मेरी पीठ पर हाथ फेर कर मुझे सहलाने लगीं।

मैंने सासू माँ के उभारों में गर्मी को महसूस किया जो मुझे बहुत शांत कर रहा था।
सासू माँ ने मेरा कुर्ता ऊपर को उठाया और ससुर जी ने पीछे से मेरी ब्लाउज का हुक खोल दिया।

मैंने सासू माँ से झिझकते हुए कहा, “आप क्या कर रही हैं माँ!”

लेकिन वासना भरा मन तो मेरा कह रहा था कि मैं आप सबकी हूँ, मुझे पूरा दिन अपना बना लो!
सासू माँ के सामने मेरे लंबे-लंबे दूध नंगे हो गए थे।

सासू माँ ने कहा, “देखो कितने सुंदर और भरे हुए दूध हैं मेरी बहू रानी के!”

मेरी तो आँखें बंद हो गई और मेरे हाथ ऊपर को उठने लगे ताकि सासू माँ मेरी कुर्ती को आसानी से मुझसे अलग कर सकें।
कुर्ती के अलग होने के बाद भी मैं अपने दोनों हाथ को ऊपर की ओर ही करके बैठी रही।
मेरी आँखें बंद थीं; मुझे नहीं पता था कि अब क्या होने वाला है, पर मन में सोच लिया कि जैसा भी हो, पति नहीं तो क्या, लेकिन परिवार तो मेरी वासना पूरी कर ही रहा है!

अचानक सासू माँ और ससुर जी ने मेरे एक-एक दूध को पकड़ कर दबाना शुरू कर दिया।

मैं सिसकारी मारने लगी, मेरे बदन में आग दौड़ने लगी।
सासू माँ और ससुर जी ने अपना मुँह मेरे दूध पर रख दिया और चूसने लगे।

ओह! क्या आनंद अनुभव होने लगा मुझे।
मैं भूल ही गई कि वह मेरे माँ और पापा जैसे हैं।

भैया और भाभी भी कहने लगे, “हमें भी चखने दो हमारी नई दुल्हन को!”
और वे मेरे दोनों बाजू में बैठकर मेरी बगल को चाटने लगे।

मेरी साँसें तेज हो गई और चूत भी गरम होने लगी थी।

मेरा पति ये सब देख रहा था और पूछने लगा, “अब तो कोई शिकायत नहीं है न हमसे!”

और मेरे सामने आकर मेरी सलवार का नाड़ा खोलने लगा।
मैंने भी अपनी गाँड उठा कर पतिदेव को मेरी सलवार उतारने की इजाजत दे दी।

उन्होंने मेरी पैंटी में अपना सिर डाल दिया और सूंघने लगे।

मेरी चूत से वासना की गंध निकलने लगी थी जो पूरे कमरे को खबर दे रही थी कि वह कितनी बेताब है चुदने को!

भाभी ने अपने कपड़े उतार फेंके और उनके दूध को मेरे मुँह में दबा दिया; मैं उन्हें बड़ी उत्तेजना में चाटने लगी।

तभी भैया ने अपने कपड़े उतार फेंके और उनका मर्दाना लंड मेरी आँखों के सामने था।
पहली बार किसी मर्द का लण्ड सामने से देखा था, इसलिए आँखें फटी की फटी रह गई।

उनका लण्ड मेरे मुँह के पास आया तो डर सा लगा कि ये मैं क्या कर रही हूँ, इसलिए मैं सिर हिलाने लगी।
लेकिन मन तो चूसने का कर रहा था।

उनका लण्ड मेरे बंद होठों से टकराता, लेकिन मैंने होंठ नहीं खोले।

उतने में भाभी ने मेरे होठों से अपने होंठ लगा लिए और गहरा चुंबन लिया।
मेरा संयम टूट सा गया और मुँह से गरम-गरम साँसें निकलते हुए मैं भाभी के होठों को चूमने लगी।

मेरे पति ने मेरी पैंटी को भी आजाद कर दिया और अपनी जीभ से चाटने लगे।
ऐसा करंट पहले कभी नहीं लगा था और मैं सारी शर्म भूलकर भैया की गाँड पर अपने दोनों हाथों के नाखून गड़ा कर, उन्हें अपनी ओर खींचती हुई उनके लंड को पागल कुत्ते के जैसे चाटने लगी।

ससुर जी भी नंगे हो गए; उनका लंड किसी हथियार से कम न था।
दोनों लंड मेरे हाथों में थे और मैं जन्नत में उड़ी, एक-एक करके दोनों को चूसती जा रही थी।

सासू माँ ने अपने कपड़े उतारकर मुझे अपने दूध पिलाए, फिर भाभी ने मुझे अपनी चूत का स्वाद चखाया।
मैं तो उनकी दीवानी सी हो गई।

सपने में भी नहीं सोचा था कि एक साथ इतने कामुक अवसर शादी की अगली सुबह मेरा इंतज़ार कर रहे थे, और मैं अपने भाग्य को कोस रही थी!

मैंने अपने पति से कहा, “आप सचमुच मेरी भावनाओं को समझते हैं, मैं हमेशा आपकी दासी बनकर रहूँगी!”
ये सुनकर वो मेरी गाँड के छेद को भी चाटने लगे।

मैंने कहा, “आप भी अपने कपड़े उतार दीजिए न!”
उन्होंने कहा, “नहीं, मेरे पास ऐसा कुछ नहीं जो तुम्हें खुशी दे!”

लेकिन उनकी उदासी से मेरा मन बेचैन हो उठा।
कितना मासूम पति! मैंने झट से उनकी पैंट उतारी और उनकी नूनी को मुँह में लेकर चूसने लगी।
उनकी नूनी बच्चों की डंडी जैसे खड़ी हो गई और हम सभी को जोर की हंसी आने लगी।

हमारी हंसी देख उन्होंने कहा, “छोड़ो मुझे, मत चूसो! ये तुम्हारे लिए नहीं बनी!”

और वे दुखी हो गए।
मैंने उनसे कहा, “मेरी चूत का पहला पानी आपने पिया और मैं भी पहला पानी अपने पति का लेना चाहती हूँ!”

और मैं उनकी नूनी चूसती चली गई।
कुछ ही देर में वे हाँफने लगे।

मैं समझ गई कि उनकी सीमा आने वाली है और उनका स्वाद मुझे मिल गया।

पति ने कहा, “वर्षा, तुम सच में हमारी अप्सरा हो!”

मैं बहुत खुश हुई और जाकर बेड पर सीधे लेट कर थोड़ा आराम करने लगी।

लेकिन आराम कहाँ?
नीचे भैया ने मेरी टांगें फैलाना चाहा।

मैंने कहा, “थोड़ा रुको न!”

लेकिन वे नहीं माने और चिपक गए मेरी चूत से।
क्या गरम जुबान थी उनकी! मेरी गाँड ऊपर उठने लगी।

उन्होंने मुझे इतना चाटा कि मैं कई बार झड़ गई उनके मुँह में।
अब तो हिम्मत नहीं थी कि हिल भी सकूँ, लेकिन भैया के उठते ही ससुर जी मेरी चूत पर टूट पड़े।

मैंने बहुत मिन्नतें की कि थोड़ी देर को छोड़ दो।
वे उठे, मैंने ‘थैंक यू पापा’ कहा.

लेकिन वे एक तकिया मेरी गाँड के नीचे फँसाने लगे।
अब मेरी चूत ज्यादा उठ गई थी।

जैसे ही ससुर जी मेरी चूत पर मुँह रखकर चाटने लगे कि मुझे बहुत तेज पेशाब आने लगा।
मैंने कहा, “पापा छोड़ो! सुसु लगी है जोर की!”

वे फिर भी मेरी दोनों टांगों के बीच मुँह फँसाए रखे थे।
मैंने उनके सिर को पकड़ कर ऊपर उठाना चाहा.
तो भाभी और सासू माँ ने मेरे दोनों हाथों को बिस्तर पर सटा दिया और मेरे दूध पीने लगे।

मैं क्या करूँ, कुछ समझ नहीं आ रहा था और ऊपर से जोर की सुसु लगी थी जो अब रुकने का नाम नहीं ले रही थी।

भाभी ने मेरे निप्पल को दाँतों से काटा और मुँह से ‘आह’ की आवाज आई और मेरी थोड़ी सी सुसु बह गई, जो बहते हुए मेरी गाँड के छेद पर आकर नीचे टपक गई।

मुझे पहली बार अपनी गरम सुसु का अहसास हुआ, जो कि सच में मजेदार था!

लेकिन मैं क्या करूँ?
मैं अपनी गाँड को उठा-उठा कर ससुर जी को पीछे ढकेलने की कोशिश करने लगी।

इतने में भैया मेरी नाभि में जुबान चलाने लगे और मुझसे अब रहा नहीं गया; फुर्र-फुर्र करके पेशाब बह निकला।

अब ससुर जी को हटना ही पड़ा.
लेकिन वे बहुत खुश हो रहे थे मेरी चूत से बहते छोटे से झरने में मुँह धोकर।

मुझे राहत तब मिली जब मेरी चूत सीटी की आवाज करते हुए पूरी रफ्तार से मूतने लगी।

सासू माँ और भाभी ने मेरी तारीफ में हँस कर कहा, “वर्षा नाम ही नहीं, बल्कि वर्षा करना भी अच्छे से आता है तुझे!”

और मुझे थोड़ी शर्म और हंसी साथ-साथ आ गई।
अब मैंने कहा कि थोड़ा नहाकर आती हूँ.

और सीधे बाथरूम जाकर अपने जिस्म को धोया और कहा कि वाकई मजा आ गया आज!

मैं ताजी-ताजी रूम वापस आई तो देखा कि ससुर जी बेड पर सीधे लेटे हुए हैं और उनका लंड 90 डिग्री का कोण बनाकर छत से बातें कर रहा है।
लेकिन मुझे क्या पता था कि ये मेरा ही इंतज़ार कर रहा है!

ससुर जी ने कहा, “आओ बेटी, ऊपर बैठो मेरे!”
मैं समझ गई कि अब ये चूत में घुसने को तैयार है।

मेरी चूत भी उतावली हो रही थी।

मैंने अपने हाथों को ससुर जी की छाती पर रखकर दोनों पैरों के घुटने मोड़कर फैलाए और धीरे-धीरे उनके लंड पर बैठने लगी।

लंड का मोटा टोपा मेरी नाजुक सीलपैक चूत को खोलने की फिराक में था, पर बार-बार फिसल रहा था।

मैंने अपने हाथों से लंड को चूत पर सेट किया और जैसे ही नीचे प्रेशर लगाया, तो टोपा घुसते ही मैं दर्द से ऊपर को उछल पड़ी।

मैंने कहा, “पापा, अभी रहने दो! ये नहीं घुसेगा!”

ससुर जी ने अपने हाथों को मेरी कमर पर कसकर पकड़ा और कहा, “एक बार फिर कोशिश करो!”

मैंने फिर से लंड को सेट किया और धीरे से बैठते ही टोपा घुसा, लेकिन ससुर जी ने मुझे ऊपर उठने नहीं दिया बल्कि नीचे से एक धक्का लगाया और मेरी चीखें निकल गई!
लंड मेरी झिल्ली को बेधता हुआ बच्चेदानी तक पहुँच गया।

पहली बार पूरा लंड चूत में धक्के से घुसा था; आँखों में अंधेरा छा गया और मेरा सिर सीधे ससुर जी की छाती पर जा गिरा।

उनका आधा लंड बाहर आ गया लेकिन आधा अभी भी चूत में फंसा था, गाँड ऊपर को उठ आई थी।
मैं उठना चाहती थी लेकिन सबने मिलकर मुझे दबोच लिया और मैं वैसी ही पड़ी ‘उफ्फ-उफ्फ’ करके सिसकारियां ले रही थी।

मैंने महसूस किया कि सासू माँ मेरी गाँड के छेद में उंगली से तेल डाल रही हैं; मुझे कुछ समझ आने लगा।

तो मैंने कहा, “छोड़िए मुझे! मुझे गाँड नहीं मरवानी, प्लीज!”

लेकिन सभी मेरी गाँड के उद्घाटन का दिल ही दिल में इंतज़ार कर रहे थे।

भैया पीछे से अपना लंड मेरी गाँड पर टिकाए खड़े थे और मैं रोते हुए बोली, “नहीं करनी शादी! मुझे मेरी मम्मी के पास वापस भेज दो, आप जबरदस्ती कर रहे हैं!”

लंड अब दबाव डालने लगा और न जाने क्यों मजा सा आने लगा और मेरी गाँड भी सहयोग देने लगी।
मैंने कहा, “भैया, आराम से! पहली बार है!”

भैया को शायद गाँड मारना अच्छे से आता था।
थोड़ा-थोड़ा दर्द होता रहा पर पता ही नहीं चला कि कब उनका आधा लंड प्रवेश कर गया।

उसके बाद तो दोनों लंड पूरी क्रिया में आ गए।
न मैं रही, न ही भैया और ससुर; बस रूम में ‘थाप-थाप’ की आवाजें ही गूंज रही थीं।

जब दोनों ने अपने आखिरी धक्के दिए, तो पाया कि हम तीनों गहरी बेहोशी में एक-दूजे पर लेटे हुए हैं; हमारी साँसें ही रह गई थीं।
उनके लंड रबर के जैसे पिचक गए और मेरी चूत और गाँड से गाढ़ा पानी बाहर बहने लगा।

हमारी आँखें तब खुलीं जब मैंने महसूस किया कि गरम पेशाब मेरी चूत की झांटों को भिगो रहा है।
मैंने कहा, “पेशाब क्यों किया पापा!”

इतना कहते ही भैया भी मेरी गाँड पर मूतने लगे।

गरम पेशाब अच्छा तो लग रहा था, पर मैंने उन्हें झूठ-मूठ का डांटा और गुस्से से अलग हो गई।
भाभी और सासू माँ ने समझाया कि हो जाता है, लो हम साफ किए देते हैं, और वे दोनों आगे-पीछे से मेरी चूत और गाँड से चिपक गईं।

क्या कहूँ, फॅमिली फक सेक्स में मजा इतना आया कि सारी शिकायतें दूर हो गई!

बस उस दिन की रात मैंने अपने पति को कहा, “मुझे अब आपके सिवा कोई और नहीं चाहिए!”

मेरे ये कहने की देर थी कि पतिदेव मुस्कुराए और कहा, “सो जा, कल तुम्हें कोई हाथ नहीं लगाएगा!”

मैं सो गई और सोचती रही कि क्या सच में मुझे कोई हाथ नहीं लगाएगा?
मैं अंदर से पति से नाराज थी पर बाहर से मुस्कुरा दी।

अगली सुबह जब लेट कर उठी थी, तो देखा कि पति के साथ उनके तीन जवान मित्र बैठे थे और सभी कातिल नजरों से घूर रहे थे।
मुझे समझ में आने लगा कि अब मेरी ‘थ्रीसम’ चुदाई होने वाली है।

मैंने उन तीन लंडों को कैसे सहन किया, ये मैं आपको अगली कहानी में बताऊँगी।

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rahulenters8@aol.com

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