मदर इन लॉ Xxx कहानी में मैं पहली होली मनाने ससुराल गया तो सासू माँ के गदराये जिस्म पर, उनकी चूचियों पर मेरी नजर जमी जा रही थी. उनको भी इसकी खबर थी.
मेरी शादी एक छोटी उम्र में यानी 18 साल में ही हो गई थी लेकिन मेरी बीवी मुझसे 5 साल बड़ी थी।
मेरी बचपन की गलतियों के कारण मेरा शिश्न यानी मेरा लंड, लंड ना रहकर, एक लुल्ली अर्थात छोगिनी बन कर रह गया था।
मेरा लुल्ली मात्र 4.5 इंच लंबा और 2 इंच मोटा था।
अपने शिश्न की कम लंबाई के कारण शादी नहीं करना चाहता था पर मेरे घरवालों ने मेरी एक न सुनी।
मेरे मम्मी की तबियत अक्सर खराब रहने के कारण मेरे दादा जी ने जल्दी शादी का दबाव बनाया और मात्र 18 साल में ही आनन-फानन में मेरी शादी एक अमीर परिवार में रिंकी नाम की इकलौती लड़की से कर दी।
मेरी सासू माँ, फूलवती देवी, जिसकी उम्र 44 साल और यौवन यूँ समझो जैसे तैयार बैठा हो बाहर निकलने को।
उनके वक्षस्थल बहुत बड़े और गोल-गोल थे।
सासू माँ हमेशा ब्लाउज के साथ पेटीकोट ही पहनती थी।
उनके निपल्स अक्सर ब्लाउज से बाहर उभरते थे।
शादी के कुछ साल बाद से ही मुझे वो काफी अट्रैक्टिव लगती थी और मैं अक्सर उनके निपल्स और मोटी-मोटी भारी जांघें और चूतड़ देखा करता था।
शायद फूलवती देवी को यह मालूम था कि मैं उसे अपनी नजरों से निहारता रहता हूँ।
यह मदर इन लॉ Xxx कहानी तब बनी जब पहली होली के दिन, सासू माँ के बुलाने पर जब मैं अपनी पत्नी के साथ ससुराल में गया तो देखा कि सासू माँ ने दरवाजा बंद कर रखा है।
मेरे पूछने पर जब सासू माँ ने बताया- गाँव के लोगों को तमीज नहीं है होली खेलने की, इसीलिए मैंने उनके साथ खेलना भी बंद कर दिया है। खासकर बूढ़े-बूढ़े बहुत लोग ठरकी हैं।
“क्या, आप हमारे साथ भी नहीं खेलोगी?” मैंने और मेरे ससुर श्रीमान वेदपाल सिंह ने पूछा.
तो सासू जी ने मुस्कुराहट के साथ बात टाल दी- दामाद जी, आप बैठिए मैं आपके लिए कुछ खाने की चीज लाती हूँ।
सासू माँ ने पहले शरबत सौंपा और साथ में बहुत सारा पकवान लेकिन शरबत के आगे सारे फीके थे।
अब मेरी सासू माँ, ससुर जी, मेरी पत्नी और मैंने, सासू माँ के बनाए व्यंजन का बैठ के आनंद लिया और उसके शरबत का भी।
अब बारी थी होली मनाने की।
इससे पहले कि मैं अपनी सासू माँ को रंग लगाता, उन्होंने मेरे नए कपड़ों पर ही रंग फेंक दिया।
“अरे! सासू माँ, इतनी जल्दी! काश मुझे कपड़े तो बदल लेने देती।”
“बिल्कुल नहीं, जमाई राजा, जो मजा नए कपड़ों पर रंग डालने का है वो पुराने पर कहाँ!” कह के खिलखिला उठी।
मैंने भी अपने जेब से रंग निकाले और सासू माँ के गाल पर मल दिया।
उनके गालों को छूते ही मेरे जिस्म में कोई और रंग ही दौड़ पड़ा।
इतना कोमल, इतना सॉफ्ट तो मेरी पत्नी का कोई भी अंग नहीं था।
ससुर जी ने होली खेलने का इंतजाम पहले से ही किया हुआ था अर्थात गाँव की वो होली जिसके बिना होली का मजा अधूरा, यानी कि कीचड़-मार होली।
इस बात की शुरुआत मैंने की और पास खड़ी रिंकी को दबोच कर गड्ढे में पटक दिया।
उसका पूरा अंग-अंग पूरी तरह मिट्टी के आलिंगन में था।
ये सब देख मेरे सासू और ससुर जी जोर-जोर से हँसने लगे और रिंकी शर्म से लाल हो गई।
रिंकी की साड़ी मिट्टी में सनी होने के कारण कई जगह से ढीली हो गई थी।
वो बेचारी शरमा के अंदर चली गई।
साथ में खड़े पापा ने सासू माँ को कुछ इशारा किया और अगले पल में सासू जी ने मुझे कीचड़ के घोल में गिरा दिया और साथ में मेरे ऊपर सासू माँ भी गिर पड़ी।
सासू माँ के बड़े-बड़े बूब्स अब मेरे मुँह के ऊपर थे।
मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था क्या करूँ?
थोड़ी देर और इस पल का आनंद लूँ, पर पास में ससुर जी भी तो खड़े थे।
होली के अवसर में लीन होते हुए उन्हें अपने ऊपर से हटाकर दूसरी तरफ पलट लिया।
साथ में अब पापा भी मम्मी से होली खेल रहे थे।
ऐसा लग रहा था कि ससुर-सासू जी की नई-नई शादी हुई हो।
पानी के अंदर से ससुर द्वारा उनके बूब्स को छूने का मुझे आभास हुआ।
अगले ही पल मम्मी ने जल्दी से उनके पप्पू को इतने जोर से दबा दिया कि पापा दर्द के मारे बाहर जा के बैठ गए।
सासू माँ होली खेलने में बहुत ही मस्त थी।
उनके खेलने के अहसास ने भी मुझे हिलाकर रख दिया था।
बार-बार उनके हाथ मेरी टी-शर्ट के अंदर घूम रहे थे।
कभी मेरे पेट पर तो कभी पीठ और मेरे निप्पल को रगड़ रहे थे।
मिट्टी के घोल में लेटे हुए मैंने भी उनके पेटीकोट के ऊपर से जाँघ को स्पर्श किया तो लगा कि उनकी चूत इधर ही पकड़ लूँ।
मेरा मन मचल रहा था और लंड तन-तन कर रहा था।
उनके पेट और ब्लाउज के ऊपर मैंने भी मिट्टी-कीचड़ उड़ेल दी।
“नहीं-नहीं इसे नहीं दामाद जी, मुझे लग जाएगी।”
“क्या?”
पर वो चुप रहीं, शायद कहना नहीं चाहती थीं।
थोड़ी देर बाद मेरी पत्नी एक-एक ग्लास शरबत लेकर आई.
फिर से एक बार हम लोग बाहर बैठकर शरबत की मिठास का आनंद लेने लग गए।
सासू माँ के कपड़ों से उनके बूब्स का आकार और निपल्स की गेहुआँ रंग की घुंडी साफ-साफ चमक रही थी।
उनके पीले पेटीकोट के अंदर लाल रंग की पैंटी भी साफ दिखने लगी थी पर बेपरवाह किए सासू जी होली खेलने में मदमस्त थी।
हम सब मस्ती करते हुए होली का परमानंद ले रहे थे।
2 घंटे होली का आनंद लेने के बाद हम सब लोग पानी की हौदी में कूद गए।
उभरे हुए सासू माँ के अंग अब एकदम साफ दिख रहे थे और मैं बगल पानी की हौदी में खड़े उनको निहार रहा था।
रिंकी के जल्दी ही बाहर निकलने के बाद हम लोग कुछ और देर पानी का आनंद लेते रहे।
ससुर जी नहाने के बाद गाँव में मेला घूमने चले गए।
मैंने पूछा- सासू माँ, क्या सूखी-सूखी होली खेलने के लिए आपने हमें बुलाया है या कुछ इंतजाम भी करोगी?
“आपकी जो फरमाइश, दामाद जी! आखिर आपकी पहली होली है हमारे साथ! आप तो हमारे मेहमान हैं।”
“क्या आप शराब पीती हैं?”
इधर-उधर देखते हुए वे बोली- कभी-कभी लेकिन आपके पापा से छुप कर!
“क्या रिंकी को पता है?”
“नहीं।” मम्मी ने जवाब दिया।
“आज मेरे साथ आप पियोगी ना?”
“नहीं, बिल्कुल नहीं। क्या बात कर रहे हो? सब लोग हैं आज घर!”
“प्लीज, प्लीज, थोड़ा सा ही फूलवती देवी जी!” मैं उनका नाम लेते हुए बोला- पापा तो आज ट्यूबवेल पे सोने वाले हैं और रिंकी को खाने में भांग खिला के सुला देंगे।
मुस्कुराते हुए माँ ने जवाब दिया- बड़े हरामी हो जमाई जी!
ससुर जी अपना रात्रि भोज अपने साथ खेत पर ही ले गए और रिंकी के खाने में सासू माँ ने ही खुद भांग मिला दिया।
मेरे शरीर के शाम से ही अंदर एक अजब सी गुदगुदी हो रही थी।
आखिर आज किसी भी महिला और अपनी सासू माँ के साथ महफिल में शरीक होने जा रहा था।
करीब 9:00 बजे रात को रिंकी के सोने के बाद हम दोनों एक बिस्तर ऊपर छत पर ले गए और साथ में रात का मजा, अपना शराब भी, जैसा हमने वादा किया था।
सासू माँ ने कुछ चखना भी पहले ही तैयार कर रखा था।
सासू जी ने अपना पिटारा खोला और मैंने अपनी आंटी से बीपी का हॉफ निकाला।
सच बोलूँ तो मैं इतना उत्सुक था कि कोई आम महिला, गाँव की औरत मदिरा कैसे पीती होगी, कैसा अनुभव होगा?
क्योंकि ये सब तो मैंने सिर्फ सिनेमा में ही देखा था।
“कौन सा माल पिलाने वाले हो, जमाई बाबू?”
“क्या! मैं? मेहमानबाजी तो आप करने वाली थी ना?”
“चलो कोई नहीं, चखना आपका और मदिरा हमारी।” हँसते हुए मैंने तंज कसा।
दोनों ग्लास में शराब डालकर सर्व करते हुए मैंने कहा- ये लीजिए सासू माँ आपकी फेवरेट ड्रिंक!
फिर चीयर्स करते हुए सासू माँ ने हाथ बढ़ाया और हमने अपने सिप शुरू किए।
आपने दामाद जी, आज तो मेरी वर्षों की तमन्ना पूर्ण कर दी। वर्षों से अकेले-अकेले छुप-छुप कर पीकर बोर हो गई थी।”
आज पहली बार था कि मैं सासू माँ से बैठ के देर तक बातें कर रहा था।
हमने बहुत सारी बातें कीं।
धीरे-धीरे शराब का असर सासू माँ के जेहन पर प्रतीत हो रहा था।
सासू जी मेरे सामने सफेद रंग के ब्लाउज और काले साया-पेटीकोट पहन के बिछौने पर तकिया का सहारा लेकर बैठी थी।
गाँव में साड़ी वगैरा कुछ खास मौकों पर ही पहना जाता है।
2 पैग गटकने के बाद सासू माँ का सुरूर बढ़ रहा था।
“आपने दूसरा बच्चा क्यों नहीं किया?” हिचकते हुए मैंने पूछा।
“किस्मत, दामाद जी। रिंकी बिटिया के जन्म के बाद आपके ससुर ने अपनी मम्मी के बहकावे में मेरे पास 2 साल तक आना बंद कर दिया ताकि अगली बार एक लड़का पैदा हो सके लेकिन एक दिन जब मैं छुप-छुप के उनके पास खटिया पर सोने गई तो वो सहवास करने में असमर्थ रहे।”
“पता नहीं मेरी सासू माँ ने उनको क्या खिलाया कि उनका अंग काम करना लगभग बंद हो गया। सासू माँ के देहांत के बाद उनको ठीक होने में 2 साल लगे। डॉक्टर ने बताया कि ये अब बाप बनने में सक्षम नहीं हैं।”
“अरे ऐसे कैसे, पापा जी ने वो सब क्यों खाया?”
“वे इस सब बात से अंजान थे, सासू ने उन्हें खाने बगैर ही खिलाया था।”
मैं ये सब सुनकर एकदम सुन्न था, दंग रह गया।
सासू माँ ये सब बताते-बताते काफी भावुक सी हो गई थी और उनके आँखों से आँसू आने लगे थे।
“आप शांत हो जाओ।” आँसू पोंछते हुए मैंने सासू जी से कहा।
“कसम है आपको जमाई बाबू, आप ये सब किसी को न बताएँगे।”
मैं उनके और समीप खिसकते हुए उनके कान में बोला- कैसी बातें कर रही हैं सासू जी।
मैंने अब जेब से सिगरेट निकालते हुए- आप पियेंगी क्या?
“नहीं, ये सब नहीं।”
“बस थोड़ी सी, चलेगी न?”
सासू जी मना न कर पाईं।
उन्होंने अपने हाथ में पैकेट लेकर एक सिगरेट निकाली और जलाते हुए बोलीं- ये लो जमाई बाबू!
क्या गजब का सीन था यारो वो!
जब वो मदहोश होकर धुआँ-धुआँ निकाल रही थीं मुँह से।
हम दोनों एक साथ कश मरने लगे।
“और पिलाओ न बाबू, बहुत आनंद आ रहा है आज तो!”
“आज कोई अपना मिला है मुझे, तुम्हारे ससुर जी तो आजकल सिर्फ मतलब के लिए आते हैं और जल्दी ही बीच में छोड़ के चले जाते हैं। आपसे बात करके दिल मेरा हल्कापन महसूस कर रहा है।”
आखिरी और तीसरा पैग मैंने धीरे से सासू जी के सामने खिसकाया।
सासू माँ की मदहोशी अब धीरे-धीरे बढ़ती जा रही थी।
सिगरेट के छल्ले वो लगातार उड़ाती जा रही थीं, शायद उनको पहले से पीने की लत थी।
गजब की सेक्सी लग रही थीं वो मदहोशी में धुआँ उड़ाए हुए।
मैं उनके मुँह से निकलते हुए धुएँ को पी रहा था।
नशे की मदहोशी में वो मेरे ऊपर सिर रखकर बातें कर रही थीं।
चाँदनी रात में उनका जिस्म दमक रहा था।
बड़े-बड़े बूब्स के शेप ब्लाउज कट में साफ झलक रही थी।
उनकी चूची-बोबे की मोटी-मोटी घुंडी उभर रही थी।
मेरी नजर हटने से मना कर रही थी।
“मुझे नजर लग जाएगी ऐसे मत देखो!”
मैं झट से हड़बड़ाया।
“मुझे पता है आपकी तमन्ना मुझे पाना है ना? सुबह से आपका स्पर्श बयां कर रहा है। जब आपने कीचड़ में मेरे बोबे पकड़े थे। मुझमें भी अंदर से आग लग गई थी।”
“फिर आपने नहाते हुए जो आज शाम का जो बंदोबस्त किया, जिससे मैं शाम से ही सपनों में खो गई थी।”
इतना बोलते ही उन्होंने मुझे ओजस्वी आगोश में भर लिया- बाबू, (मुझे प्यार से वो बाबू ही कहती थीं) प्लीज छोड़ना नहीं मुझे! वर्षों हो गए प्यार किए। आपके पापा में तो वो बात रही नहीं और किसी बाहरी मर्द से मैं दोस्ती करना नहीं चाहती।
मैंने भी उनकी कमर को ऐसे पकड़ा कि बड़ी-बड़ी चूचियों का स्पर्श-दबाव मेरी छाती पर था।
उनके बदन की गर्माहट मेरे बदन में समा रही थी और मेरा मन बेकाबू हो रहा था।
सासू माँ के होठों को चूमते हुए- सासू जी, मेरी मम्मी आपको कब से मिस कर रहा था मैं!
माँ के मुँह से जो सिगरेट की महक भी आ रही थी।
उनके ब्लाउज के अंदर से मैंने उनके बूब्स पकड़ने चाहे।
“हुक क्यों नहीं खोलते आशिक दामाद, नहीं तो हाथ के साथ मेरे चूचियाँ भी दर्द करेंगी।”
चूचों को छूते ही मैंने उन्हें जोर-जोर से मसलना शुरू किया।
“उई माँ मैया! मेरी आह आह आह! और जोर से दबाओ बाबू!”
सासू ने अपना ब्लाउज खोल दिया और एकदम अब उसके आजाद बोबे मेरे सामने थे।
इतने बड़े?
जिंदगी में अपनी आँखों से घूरता था वो एकदम मेरे सामने खुले पड़े थे।
फूलवती देवी के बूब्स चूची बैल बूब्स टाइप थे जो आगे से बहुत ही विशाल और गोल-मटोल थे।
“सासू जी, पापा कैसे संभालते हैं? क्या चूचे पाए हैं आपने मेरी फुल्लो!”
मदहोश लेटी सासू, मुझे स्तनपान कराने के आनंद सोच रही थी।
उनके बगल के लंबे बाल की सुगंध मुझे चाटने को उकसा रही थी।
“चाट लो न, चाटो मेरी काँख को, क्या देख रहा है भड़वे, अपने ससुर की तरह चाटो न!”
मैं सासू के ऊपर बूब्स को पीते हुए बगल के बाल को भी साथ-साथ सूँघ रहा था।
मेरी सासू की गुदगुदी उन्हें बेचैन कर रही थी।
मेरे लुल्ली का अहसास उन्हें पेटीकोट के ऊपर से महसूस हो रहा था और अपनी चूत के उभार को ऊपर बार-बार उठा रही थीं।
ऐसा लग रहा था कि उनकी चूत भी उभरी हुई दो फाँकों वाली है।
पेटीकोट को ऊपर खिसकाते हुए, उनके चूत पर मैंने हाथ फेरना प्रारंभ किया।
सासू माँ अपनी जीभ से मेरी जीभ को पकड़ रही थीं।
कसम से एक अनुभवी महिला के साथ चूत-सुख का एक अलग ही अनुभव होता है।
बहुत ही खुशनसीब था आज मैं, जो अपनी ही सासू माँ जिसकी मैं चुदाई की कल्पना करता आ रहा था, वो मेरे बगल में अपनी झाँट और बगल के बाल एकदम खोल के पड़ी थी।
मेरी नजर डोकरी के अंग से हटने का नाम न ले रही थी।
नीचे खिसकते हुए जैसे मेरे हाथ उसके बूब्स से हटने को हुए, पकड़ते बोलीं, कहाँ जा रहा है भोसड़ी के जमाई, मेरी माँ चोद ना! फाड़ दे रिंकी की तरह फाड़!
सासू ने ने मेरे कच्छे में अपना हाथ डाल के मेरे लुल्ली को पकड़ लिया।
वो बोली- ये इतना पतला है और छोटा भी, मेरी रिंकी कैसे खुश रहती होगी? हाय रे मेरे रिंकी की किस्मत!
“क्या बताऊँ सासू माँ उस साली को बहुत बड़ा चाहिए, चुदवाती वक्त और, और घुसाओ ही बोलती रहती है। पर आप चिंता न करो, छोटा है पर खोटा नहीं। आपको खुश कर ही देगा। वैसे भी आप रिंकी जितनी हवस तो होगी नहीं।
“देख के तो न लगता कि कुछ कर पाएगा, खैर मेरा क्या, मैं तो तुझसे और न चुदाने वाली दोबारा!”
“कोई नहीं फुल्लो, डार्लिंग आज तो मूड न खराब कर। अब जल्दी से कराओ न, मेरे बदन में आग दहक रही है।”
लेकिन मैं तो डोकरी सासू को एक ऐसा अहसास देने को था जो उसको आज तक नसीब न हुआ।
नाभि को चूमते हुए मैं उसकी झाँटे भरी काली चूत के समीप जा रहा था।
सासू माँ की चूत तो कसम से बहुत ही बड़ी थी और फैली हुई।
दोनों फाँकें उसकी सुंदरता में चार चाँद लगा रही थीं।
झट से मैंने अपना मुँह उसकी चूत पर रख दिया।
रखते ही डोकरी अपने आप से बाहर होने लगी- उई मैया, मैया री मर गई! आहे आह आहआ ऊओ ओओ आह अह! बस बस करो न बाबू। ये क्या कर रहे हो। बहुत गंदा है ये।
“चुप कर फुल्लो, अब देख तू कितने मजे दिलाता हूँ।”
“सच में तेरी जीभ तो मेरी चुदाई ऐसे कर रही थी जैसे कि लंड। तुम्हारे पापा की चुदाई में भी ऐसे ही आनंद आता था कभी। पर मेरी सास प्रेमवती न तो खुद चुदवाती थी और न ही मेरे आदमी को छोड़ती थी, गुलाम बना के रखा था प्रेमवती ने!”
“अब घुसेड़ दो न मेरी बसंती में, मेरी चूत में और न तड़पाओ।”
“चूत किसकी चूत? ये तो भोसड़ा है मम्मी जी आपका। पर मुझे अनुभवी बूढ़ी मम्मियों की भोसड़ी बहुत पसंद हैं। मम्मी, एक बार पलट जाओ न, आपकी गाँड सूँघनी है।”
माँ के पलटते ही, मैंने अपना मुँह उसके गुदा पे रख दिया कोमल-कोमल नितंबों के बीच।
मैं उनके बड़े-बड़े विशालकाय चूतड़ों के ऊपर कूद रहा था।
अब उनके बड़े-बड़े गांड के बीच अपना लुल्ली फँसा दी।
मैंने सासू को अपनी गांड फैलाने को कहा ताकि मैं उसकी गहराई तक पहुँच सकूँ।
“मम्मी, गांड का छेद तो बहुत ही बड़ा है तुम्हारा?”
“तुम्हारे पापा की प्यारी जो है ये, आजकल वो चूत कम मेरी गांड ज्यादा मारते हैं।”
मैं हैरान रह गया, मेरे पापा मेरी सास को चोदते हैं, “क्या मम्मी, आपने तो मेरे अरमान ढीले कर दिए। आपकी गांड में पहला लंड मेरा होगा ये सोचा था। अब तो मैं आपकी चूत ही मारूँगा, क्यों मरवाओगी न?”
“बेटा, कब से खुजली हो रही है इस चित्ती में। मेरी खुजली मिटा दे न जल्दी।”
“लेकिन तभी, जब आप मेरा लुल्ली पियोगी।”
“नहीं-नहीं, ऐसा मत करो, कभी बाद में पी लूँगी। अभी और न तड़पाओ।”
मैंने जिद की तो माँ ने मेरा लौंडा अपने हाथ में पकड़ लिया- अरे ये तो छोटा है, लुल्ली है ये तो!
“सासू जल्दी से लो ना, नखरे मत करो।”
अपनी जीभ से चाटते हुए धीरे-धीरे बुढ़िया मेरी लुल्ली को मस्त करके चूस रही थी।
क्या मजा है कसम से इसमें तो?
उसके मुँह से बार-बार थूक भी बाहर आ रहा था जो मेरे लिंग को बुरी तरह गीला कर दिया था।
पहली बार था कि मेरी सासू कोई लंड पीने का अनुभव ले रही थी।
5 मिनट तक पीने के बाद बोलीं- ये तो नमकीन लग रहा है अब!
“सासू जी, जाना क्या तुम अपनी चूत मेरे मुँह पे रखोगी, मुझे और चाटना है, मेरा पीने का मन है।”
“साले मदरचोद, ये ले। मेरा मूत भी पी जाना! और चाट।”
हम दोनों अब एक-दूसरे के यौनांग को मुख मैथुन करने में मदहोश थे।
फुल्लो के मुँह से मादक आवाज निकल रही थी जिसकी ध्वनि बढ़ती जा रही थी- अब चोद रंडी के, इसे चोद जैसे तेरी माँ चुदवाती है मेरे समधी के लंड पे उछल-उछल के! क्या गांड भी मरवाती है वो। पेलमपेल गांड मारते हैं मेरे समधी तेरी माँ की!’
“ये क्या कह रही हो?”
“क्या तुझे नहीं पता, तेरी माँ तेरे ससुर से पिलवाती थी। तेरी मम्मी ने तो मुझे बताया था जब तेरे ससुर ने एक रात बेहोश कर दी थी तेरी माँ।”
“अच्छा?”
“ये ले बदला, उसका बेटा तेरी माँ चोदेगा। फुल्लो, चुदक्कड़ हो जाएगी तू आज।”
मैंने सासू की चुत्ती में अपनी लुल्ली डाल दी।
“और भीतर डाल न, घुसेड़ और अंदर इस कुएँ में और खुदाई कर! चोद दे अपनी सासू को! याद कर जैसे तेरी मम्मी चुदी थी तेरे ससुर से।”
मैंने सासू को घोड़ी बना के 10 मिनट तक पेला और मेरा पानी आने वाला था।
“माँ जी क्या करूँ, मेरा बिरिया आने वाला है। बाहर निकाल दूँ क्या?”
“क्यों साले? मेरी इसी भोसड़ी में निकाल ना। अब बच्चे नहीं होंगे मुझे। निकाल दे अपना सारा पानी।”
पानी निकाल के मुझे जो अनुभूति हुई आज वो कभी नहीं!
अपनी पत्नी रिंकी के साथ में इस तरह चुदाई का आनंद न मिला।
गर्म सासू के चेहरे पे खुशी का अहसास झलक रहा था।
नशे की मदहोशी से अब लगभग बाहर थीं।
“वाह! बेटा, वाह!” कह के झड़ सी गईं और चैन की साँस लेने लगीं- क्या बात है लुल्ली धारी, छोटी जरूर है लेकिन ऐसा लंबा मजा दिया है कि तुम्हारे ससुर और पापा भी न दे पाए।
सासू के होठों को चूसते हुए मैंने उनके गाल भी लाल कर दिए थे।
“बस करो अब दर्द हो रहा है। बहुत दर्द है।”
मित्रो, सासू माँ को चोदने की पहली यात्रा उसी की बाहों में समापन हुई।
सुबह मेरी सास रिंकी के जागने से पहले ही अपने कमरे में आ गईं।
दोस्तो, कैसी लगी मेरी मदर इन लॉ Xxx कहानी?
किस-किसने कल्पना की है, ऐसे ही चुदाई की, वो भी सहवास करे।
जरूर बताएँ। धन्यवाद।
Rsa.mkb@hotmail.com