आंटी नेफ्यू X स्टोरी में मेरे पति के देहांत के बाद मुझे लंड की जरूरत पड़ी. संयुक्त फॅमिली में मेरे देवर का परिवार भी है. देवर का बेटा गठीला जवान हो गया. मेरी नजर उसके लंड पर टिक गयी.
सभी को मेरा नमस्कार.
मेरा नाम संगीता है, उम्र मेरी 47 साल है.
मेरे पति भी मेरी ही उम्र के थे लेकिन उनका एक वर्ष पहले देहांत हो गया था.
मेरा मेरे पति से जिस्मानी रिश्ता चरम पर रहता था; हम लोग जमकर चुदाई करते थे.
मेरे परिवार में मैं, मेरी बेटी है. उसकी हाल में ही शादी हो गई है.
मेरे देवर देवरानी और उनका जवान बेटा 27 साल का है, उसका नाम अभिजीत है.
हम सब संयुक्त परिवार हैं.
ये आंटी नेफ्यू X स्टोरी मेरी और अभिजीत की है जो पति के गुजरने के बाद ही शुरू हुई थी.
अभिजीत शुरू से अव्वल रहा है. वह 23 वें साल में नौकरी पर लग गया था.
नौकरी के बाद वह हम लोगों से दूर रहने लगा था.
पिछले साल वह मेरे पति के देहावसान के समय घर आया था.
फिर सब कुछ धीरे धीरे नॉर्मल होने लगा था.
अभिजीत एक महीने बाद वापस अपने काम पर जा रहा था.
जाने से एक रात पहले वह मुझसे मिलने मेरे रूम में आया.
ना जाने वह अपने दिल में क्या लेकर आया था.
उस वक्त मैं सूट में थी.
मैंने तब दुपट्टा नहीं ले रखा था.
मैं सूट और साड़ी दोनों पहनती हूं.
उसके आते ही मैंने दुपट्टा डाल लिया, पर तब तक शायद वह मेरे उरोजों का नाप ले चुका था.
मेरी बेटी भी अभिजीत से मिली, थोड़ी देर बैठी, फिर वह अपने रूम में चली गई.
अब हमारी बातचीत शुरू हुई.
अभिजीत- ताई, मैं कल जा रहा हूं!
वह मेरे भरे हुए उरोजों को और चेहरे को देखते हुए बोला.
मैं- हम्म … देखो अब कैसे होगा सब … रानू की शादी वगैरह का सब सोच कर रखा था!
अभिजीत- अरे बड़ी मम्मी, सब हो जाएगा. आप चिंता न करो.
वह अभी भी मेरे होंठों को खा जाने वाली नजर से देख रहा था.
मैं- कैसे?
अभिजीत- मैं हूं ना!
इस बार उसकी निगाह मेरे दुपट्टे के पीछे झांक रही थी.
उसकी निगाह जैसे मेरे सूखे उरोजों पर पानी डालना चाह रही थी.
मैं तनिक जज्बाती हो गई और बोली- हां अब तुम और तुम्हारे पापा ही सहारा हो!
अभिजीत- ठीक है ताई … अब मैं चलता हूं.
चलते समय वह मुझे मुठ्ठी भर रुपए देने लगा.
वह रुपए पकड़ाते हुए उठने लगा.
मैं- नहीं रहने दो!
रुपए लेने देने में तीन चार बार आना-कानी हुई.
अभिजीत- रख लीजिए, नहीं तो मम्मी कहेंगी क्या बात हो रही थी!
उसका ये इशारा था कदम बढ़ाने का … या बस परिवार प्रेम … नहीं मालूम!
मैंने ले लिए.
हमारे परिवार में लड़कों को महिलाएं ज्यादा गले-वले से नहीं लगाती हैं जैसे आजकल महिलाएं बेटे भतीजे सबके संग तस्वीर लेकर फोटो लगाती हैं.
पर उस समय उसकी बात ने मुझे जज़्बात से भर दिया और मैं उठकर उसके गले लग पड़ी.
इस गले लगने से ठीक पहले मेरे मन में कोई गलत बात नहीं थी, ना जीत के लिए कोई दो राय थी मेरे मन में!
पर उसके गठीले बदन ने और उसकी एक मर्द की मजबूत पकड़ ने मेरी छाती में रफ्तार दे दी थी.
अभिजीत की मजबूत पकड़ ने मेरी चूचियों की सख्ती का जायजा ले लिया.
फिर हम दोनों अलग हुए.
वह चला गया.
बस उसकी बांहों की सख्ती और बदन की गर्मी मेरे जहन में बैठ गई.
वह वहां चला गया और कई दिन बाद उसने मुझे फोन किया, वह भी रात को 10 बजे.
हमारे बीच फोन पर धीरे धीरे नॉर्मल बातचीत होने लगीं, मगर उसकी सांसें मुझसे बात करते हुए तंग रही थीं.
शायद वह मेरी आवाज से जोश पा रहा था.
फिर बातें करते करते उसने मुझसे पूछा- अब फोन रखने के बाद आप क्या करोगी?
मैं- थोड़ा मोबाइल देखूंगी और सो जाऊंगी.
फोन रखते ही व्हाट्सएप खोला, तो अभिजीत ने जस्ट नाउ में स्टेटस लगाया हुआ था.
व्हाट्सएप पर उसने पिक लगाई थी, जिसमें जिम की फोटो डाली थी.
उस फ़ोटो में वह पसीने में लथपथ था और उसका बदन शीशे सा चमक रहा था.
शायद ये आकर्षण का पहला कदम था, मुझे उसे देखते ही काफी देर तक उसकी बांहें याद आती रही थीं.
मैं उसके स्टेटस पर कमेंट्स लिखने लगी थी- इतनी कौन सी मेहनत कर रहा था, जो पसीना छोड़ रहा है!
फिर मैंने भेजा नहीं.
पर शायद उसने टाइपिंग करते हुए देखा था, ये उसने मुझे बाद में मेरे साथ हम बिस्तर होते समय बताया था.
धीरे धीरे ऐसा चलता रहा.
एक साल बाद बेटी की शादी में उसका आना हुआ.
अपनी बड़ी बहन की शादी के लिए वह एक महीने पहले आ गया था.
अपने माता पिता से छुप छुप कर उसने शादी में बहुत पैसा खर्च किया.
वह जिस दिन आया था, मैं उस दिन से शुरुआत करती हूं.
वह आया तो जिस्म से एकदम बदल चुका था.
उसका गठीला बदन देखकर मेरे मन में उन्माद ने अंगड़ाई ले ली थी.
उसने पैर छुए तो उसके स्पर्श ने तरंग छेड़ दी.
यह आकर्षण की ओर दूसरा कदम था.
हम सबने साथ में खाना-वाना खाया और बातें कीं.
रात को वह हमारे कमरे में आया और मुझसे व मेरी बेटी से बात करने लगा.
वह बार बार मुझे देख रहा था और मैं उसे.
उसका देखना मेरे मन में हलचल कर रहा था.
अभिजीत पूछने लगा- अब बताइए कैसे क्या करना है!
मैं- दीदी से पूछो कि उसकी कब से शॉपिंग वगैरह करनी है!
बेटी शर्मा गई.
वह शर्मीली ज्यादा है.
‘मैं क्या जानूं मम्मी, आपको मालूम है. आप सब शॉपिंग वगैरह कर लो. मैं बस लहंगा लेने जाऊंगी.’
ये कहकर बेटी अपने कमरे में चली गई.
मैं- छोड़ो ये सब, कल से देखा जाएगा. ये बताओ कैसे चल रही जॉब और जिंदगी!
अभिजीत- अब नई कंपनी में हो गया हूं. बस दीदी की शादी के एक महीने बाद की ज्वाइनिंग है. रूम का भाड़ा कंपनी देगी तो एक इंडिपेंडेंट फ्लैट ले लिया है. एडवांस पेमेंट कर आया हूं. नीचे मकान मालिक रहते हैं … पति पत्नी. सामान भी रख आया हूं. दो कुर्सी, एक टेबल, पलंग मकान मालिक ने पहले से ही लगा रखा है.
मैंने उसको देखते हुए पल भर कुछ सोचा कि बेटी को लंड मिल गया दामाद का, अभिजीत की मम्मी लंड खा ही रही है देवर का. मैं भी लंड का जुगाड़ कर लूं.
हालांकि हम तीनों ने अभिजीत का लंड खाया, इसको अगली कहानी में विस्तार से लिखूंगी.
यह तीसरा कदम था आकर्षण का.
मैं- यह बात देवर देवरानी को मालूम है?
अभिजीत- नहीं.
बस यही बात सुनकर मेरी वासना ख्वाबों में अभिजीत के साथ उस फ्लैट में बिस्तर पर लेट गई.
बस एक महीने में मुझे उसे अपना दीवाना बनाना था क्योंकि मुझे अब उससे चुदने जाना ही था.
उस रात मेरी छातियां सख्त और बड़ी होने लगी थीं.
थोड़ी देर बाद अभिजीत चला गया.
खाना-वाना खाने के बाद सुबह एक ढीला सूट डाल कर अभिजीत के रूम में गई.
वह ऐसे ही लेटा था.
मैं- अभिजीत, चलो चलते हैं शादी का कार्ड वगैरह लेकर … आज प्रिंट के लिए दे दिया जाए!
अभिजीत तुरंत उठा और गाड़ी निकालने लगा.
मैंने अन्दर जाकर बेटी से पूछा- क्या क्या लेना है?
बेटी- मम्मी इनर वियर ले लेना. फिर बताती हूं और क्या क्या लेना है!
मैंने मन ही मन बेटी को धन्यवाद किया एक और आइडिया देने का, जो मेरी कहानी को आगे बढ़ाएगा.
हम लोगों ने कार्ड लिए और निकल गए.
रास्ते में मुझे इसकी शुरुआत करनी थी.
घर से थोड़ी दूर जाने के बाद मैं थोड़ा अभिजीत की ओर सरक गई, जिससे मेरी चूचियों पर दबाव पड़ने लगा.
पूरे दो साल बाद किसी मर्द से मेरी चूची टकराई थीं.
उफ्फ … वह पल.
धीरे धीरे मैं उससे बात करने के बहाने और उसकी तरफ को बढ़ी.
मैंने उसकी कमर में हाथ डाला और अपनी चूचियां उसकी पीठ में एकदम सटा दीं क्योंकि मैं उसे अपना दूसरा पति मान चुकी थी.
अभिजीत में थोड़ी असहजता बाकी थी, पर वह संभल गया.
मैंने जब जब मौका पाया, रगड़ कर मजा लिया और अभिजीत को अपने मम्मों का स्पर्श कराती रही.
क्या बताऊं … बहुत मजा आ रहा था.
अब अभिजीत भी मजा लेने लगा, बात करने लगा.
दिन भर खरीदारी हुई.
मैंने बेटी और अपने लिए इनर वियर भी लीं.
अपने लिए जान बूझकर छोटा साइज लिया, ये आपको बाद में पता चलेगा कि ऐसा क्यूं किया था!
लगभग तैयारियां हो चुकी थीं.
अब मुझे भी अपनी चूत पर अभिजीत के लंड की मुहर लगवानी थी.
शादी से दो दिन पहले मैंने अभिजीत को बुलाया अकेले में.
मैं- अभिजीत बेटा मेरा एक काम कर दो!
अभिजीत- बताइए.
मैं- उस दिन मैं इनर वियर लाई थी, साइज डिफर है. तुम बदल कर ले आओ.
अभिजीत शर्माते हुए बोला- मैं … मैं कैसे .. वहां क्या बोलूंगा?
मैं- सब नॉर्मल है. तुम जाकर कह देना कि इसका एक नंबर साइज बड़ा दे दो.
पहले तो मैंने सोचा कि अभिजीत को अपना साइज भी बता दूं, फिर सोचा कि सीधे हाथ से ही नपवा दूँगी.
वह चुप था तो मैंने वापस कहा- नहीं तो तुम उससे मेरी फोन पर बात करा देना.
इतनी सी बातचीत में अभिजीत के लंड में तनाव आ गया था, इस खुशी को मैं बयां नहीं कर पाई.
शादी वाले दिन अभिजीत बहुत खूबसूरत लग रहा था. मुझे उसके साथ अकेले में फोटो लेनी थी.
मुझे उसके साथ उसके सीने से अपनी चूचियां सटा कर … पर घर में बहुत सारे मेहमान थे!
बस खुशी थी कि बेटी की विदाई होगी और मेरी चुदाई होगी.
शादी बीत गई.
शादी के चार दिन बाद अभिजीत जाने वाला था, ये मुझे मालूम था.
मैं, देवर देवरानी, अभिजीत डिनर पर बात कर रहे थे.
मैंने देवर देवरानी से कहा- मैं अभिजीत के साथ चली जाती हूं. घूम आऊंगी और एक महीने बाद आ जाएंगे. तभी हम दोनों बिटिया की विदाई कराने को चले जाएंगे. मेरा भी मन लग जाएगा, अभिजीत का सही से खाना पीना भी हो जाएगा.
ये बात करने के बाद मैंने अभिजीत का चेहरा देखा.
उसकी आंखों में एक चमक थी, अलग खुशी … शायद हम दोनों एक दूजे के इरादे जान चुके थे.
देवर- ये तो बढ़िया है, घूम आइए भाभी!
देवर देवरानी मेरी बात कभी नहीं टालते- जीत बेटा, अपनी बड़ी मम्मी को ले जाओ.
अभिजीत तुरंत बिना रुके बोला- हां ठीक है पापा, पर पापा मैंने टिकट अकेले की कर ली है.
देवर- अरे ठीक है, तो टिकट कैंसल कर लो. आप दोनों बस से चले जाओ!
अभिजीत- ठीक है.
मैं खुश थी, शादी बेटी की हुई थी और हनीमून पर मैं जा रही थी.
मैंने सारी तैयारियां कर लीं.
शाम को निकलने से पहले देवरानी से ठिठोली करते हुए- एक महीने अब मजे मारना मेरी रानी!
हम दोनों खिलखिला कर हंस दीं.
हालांकि इस सब का मतलब अभिजीत से चुदने को लेकर नहीं था.
हम दोनों का सफर वोल्वो वाली बस से था.
शाम 7 बजे हम दोनों बस में सवार हुए तो देखा कि ये टू सीटर वाली सीट थी.
मैं खिड़की की तरफ बैठ गई थी.
सफर शुरू हुआ और हम दोनों की बातें शुरू हो गईं.
औपचारिक बातें होती रहीं.
कुछ दूर का सफर तय हुआ, फिर बस एक ढाबे पर रुक गई.
उधर बस वाले ने कहा कि खाना आदि खा सकते हैं.
तो हम दोनों ने खाना खाया.
अब रात के दस बजे का वक्त हो गया था.
धीरे धीरे रात गहराने लगी और बस की लाइट्स बंद हो गईं.
मुझे इसी पल का इंतजार था कि कब मैं अपने मर्द के करीब आऊं!
अब मैंने गहरी बातें करनी शुरू कीं.
मैं- जीत, मैं तुम्हारी बहुत शुक्रगुजार हूं, जो तुमने इतनी हेल्प की … पैसा रुपया हर व्यवस्था तुम और तुम्हारे पापा न करते तो क्या होता मेरा!
अभिजीत- दीदी, पापा की बेटी है और मेरी बहन है. हम नहीं करते तो कौन करता!
मैंने और अभिजीत ने एक दूसरे से अपने सिर जोड़ लिए थे.
नहीं मालूम था कि यह सब वक्त करा रहा था या दोनों की करीब आने की चाहत करवा रही थी.
हम लोग अपनी बातें अब धीमी आवाज में करने लगे थे क्योंकि लोग सो गए थे.
मैंने अपनी एक चूची अभिजीत की कोहनी से सटा दी.
दूध दबवाने में बहुत मजा आने लगा था तो मैंने अपने दूध को नहीं हटाया और अभिजीत ने भी अपनी कोहनी नहीं हटाई.
मैं- अभिजीत, तुमने अपनी बहन के लिए बाप का फर्ज निभाया है.
जबकि मैं मन ही मन सोच रही थी कि अब मेरे पति का भी फर्ज निभा दो मुझे ले चल रहे हो तो मुझे चोद देना अपनी रखैल बनाकर … मैं राजी हूँ तुम्हारे लौड़े से खेलने के लिए!
यही सब सोचती हुई मैं अपनी चूची को उसकी कोहनी पर दबाती हुई दूध को मिंजवाने सी लगी थी.
मेरी चूत पनिया रही थी और अभिजीत का क्या हाल था … यह मुझे उसके लंड से जायजा लेना था.
अभी तक मैंने अपने इस नए मर्द का लंड नहीं देखा था.
हालांकि इसके साथ अपनी सुहागरात पर ही उसके लौड़े को देखने का मन था, पर उसको छूना जरूर था.
मैंने बहाने से कहा- पानी की बॉटल उतार दो ऊपर से!
अभिजीत खड़ा हुआ और उसी वक्त ड्राइवर भाई साहब ने ऐसे गाड़ी घुमाई कि अभिजीत ऊपर का लोहे का डंडा पकड़ कर संभलने की कोशिश करने में लग गया और मैं अभिजीत की ओर गिरने को हुई, तो मेरे एक हाथ ने अभिजीत की जांघ को पकड़ा और दूसरे हाथ को मैंने जानबूझ कर अभिजीत के लौड़े पर लगा दिया.
उसका लंड उसकी टाइट जींस में अपना रूप धारण किए हुए था.
मेरी हथेली मचल उठी, उसे लंड का स्पर्श जो मिल गया था.
मैंने हथेली को मुट्ठी में तबदील किया तो समझ में आया कि अभिजीत का लंड बहुत बड़ा और मोटा लंड था.
बाप रे … ऐसे लंड से चुदूँगी मैं … आह मन को मजा ही आ गया!
धीरे धीरे रात हुई.
मैं उसकी गोद में सरक कर उससे चिपक गई और सोने का नाटक करने लगी.
मेरी चूची रगड़ खा रही थी और चूत पानी टपका रही थी.
सच में बड़ा मजा आ रहा था.
अभिजीत ऐसे ही टिक कर सो गया था.
मैंने अच्छे से उसके लंड पर हाथ फेर कर जायजा लिया.
लगभग साढ़े सात इंच का था मेरे पति से कहीं बड़ा और मोटा तगड़ा अजगर जैसा सांप था.
चुत को चुदने की चुल्ल होने लगी पर जैसे तैसे रात बीती.
सुबह हम दोनों अभिजीत के नए फ्लैट पर आ पहुंचे.
अभिजीत दो दिन बाद अपने नए दफ्तर को जॉइन करने वाला था.
हम दोनों ने सुबह के काम से फुर्सत ली और नाश्ता वगैरह किया.
अब पाठको, आप ये न कहना कि इतने दिन बंद पड़े घर में खाना कहां से आया?
वह सब मैंने रात को ढाबे से ही पैकट वाला फूड ले लिया था.
आजकल रेडीमेड चाय भी आने लगी है तो पाइपलाइन वाली गैस के चूल्हे पर पानी गर्म किया और चाय बन गई.
नमकीन व नाश्ता करके पेट को शांत किया.
मुझे अब मुद्दे पर आना है.
उस सबको मैं सेक्स कहानी के अगले भाग में लिखूँगी.
आप अपने मेल लिख कर बताएं कि आपको आंटी नेफ्यू X स्टोरी में कितना मजा आ रहा है!
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