न्यूड मॅाम न्यूड सिस्टर स्टोरी में मैं अपने घर की लड़कियों औरतों को नंगी नहाती देखता था क्योंकि हमरे घर में बाथरूम नहीं था, सब आंगन में हैण्डपम्प पर खुले में नहाती थी.
हाय दोस्तो, मैं राकेश फिर से अपनी आप-बीती सेक्स कहानी लेकर आया हूँ.
मेरी पहली कहानी
सगी बहन की चुदास और मेरा कुंवारा लंड
तो आपने ज़रूर पढ़ी होगी. आशा है आपको बहुत मज़ा भी आया होगा.
जिसने नहीं पढ़ी, वह एक बार जरूर पढ़ ले.
तो जैसा कि आपने पिछली सेक्स कहानी में पढ़ा था कि कैसे मेरी बहन बच.पन से ही मुझसे चुदवाती थी और किसी को कानों-कान खबर नहीं थी.
मैंने आपको बताया था कि हमारे घर में बाथरूम नहीं था, इसलिए सब लोग घर के आंगन में ही हैंडपंप के पास नहाते थे.
मर्दों का तो चलो कोई बात नहीं, पर औरतों के लिए जरा परेशानी का सबब था.
इस न्यूड मॅाम न्यूड सिस्टर स्टोरी में मेरी आँखों देखी घटनाएँ हैं.
इसी लिए हमारे घर की औरतें यानि मेरी मां और दादी सुबह बड़ी जल्दी नहा लेती थीं.
उनके बाद मर्द लोग नहाते थे.
मैं थोड़ा देर तक सोता था इसलिए मेरे उठने से पहले ज़्यादातर सब नहा चुके होते थे.
हम सब भाई-बहनों को स्कूल जाना होता था तो हमें ले जाने के लिए खाने का टिफिन समय पर तैयार होना जरूरी होता था.
हमारे घर का एक और नियम था कि खाना नहा कर ही बनाना है इसलिए भी मम्मी और दादी जल्दी नहा लेती थीं.
जब तक मैं छोटा था, तब तक तो कोई बात नहीं थी.
पर जब मैं अपनी बहन के साथ चुदाई करने लगा, तो मुझे अब सब समझ में आने लगा था.
हालांकि मेरे घर के लोगों को थोड़े न पता था कि मैं चोदने वाली उम्र में आ गया हूँ. वे लोग अभी भी मुझे छोटा ही समझते थे.
शायद इसी लिए मेरी मां और मेरी दादी भी मेरे सामने नंगी होकर नहाने में जरा भी नहीं शर्माती थीं.
मेरी दादी की उम्र उस समय ज्यादा रही होगी, मुझे पता नहीं है.
वे जब नहाती थीं तो ऊपर से पूरी नंगी हो जाती थीं.
वे कभी ब्रा नहीं पहनती थीं और ब्लाउज़ खोलते ही वे ऊपर से नंगी हो जाती थीं.
मैं अगर वहां रहूँ तो भी वे अपने दूध नहीं छुपाती थीं.
बाकी दिन तो सबको स्कूल जाना होता था, इसलिए सब जल्दी-जल्दी नहा लेते थे … पर रविवार को सब आराम से नहाते थे.
उसमें मेरी दादी अपने ब्लाउज़ को खोल कर सिर्फ़ पेटीकोट में बैठ कर नहाती थीं.
दादी के मम्मे लगभग 40 साइज़ के रहे होंगे.
ये तो मुझे साइज़ का पता अब चला है कि मम्मों का साइज़ 34 36 या इसी तरह के नाप में होता है तो आपको बता पा रहा हूँ, वर्ना तो यही कहता कि उनके दूध बड़े बड़े थे.
वे अपने मम्मों को खूब अच्छे से साबुन लगाकर मसलती थीं, फिर उन्हें रगड़ रगड़ कर पानी से धोती थीं.
उन्हें हर रविवार को अपनी पीठ में साबुन लगाकर रगड़वाने की आदत थी.
इसलिए वे हर रविवार को किसी न किसी को बोलती थीं कि पीठ में साबुन लगा दो!
कई बार तो मैंने भी लगाया था, पर उस टाइम मैं बूढ़ी महिला के साथ भी सेक्स होता है, यह नहीं जानता था तो कोई ज़्यादा अहसास नहीं होता था.
दादी ज़्यादा उम्र की थीं, इसलिए मेरा कोइ ज्यादा इन्टरेस्ट नहीं था.
वैसे भी उस टाइम तो जवान लड़की के प्रति ज्यादा आकर्षण होता था.
बूढ़े को कौन पूछता है?
पर आज तो कोई भी छेद मिल जाए, सबको चोदने का मन करता है.
मैं दादी के मम्मों को ऊपर से तिरछी आंखों से देख लेता था, पर उनको कोई फ़र्क नहीं पड़ता था.
जब तक मैं उनकी पीठ में साबुन लगाता, तब तक वे अपने पेटीकोट को ऊपर करके अपनी चूत में मग से पानी डालती थीं.
साया के ऊपर होने से मुझे पीछे से कुछ दिखता नहीं था पर मैंने देखने की कोशिश ज़रूर करता था.
ऐसा चूत देखने का मौका तब मिलता, जब कोई दूसरा उनकी पीठ में साबुन लगाता और वह अपना चूत धोती रहतीं.
तभी मैं कहीं से सामने आ जाता तो अचानक ही उनकी चूत के दीदार हो जाते.
दादी के पेट पर थोड़ी ज़्यादा चर्बी थी जिसके कारण वे चूत के ऊपर तक आ जाती थी.
उस वजह से चूत ढक जाती थी और वे बैठी रहती थीं इसलिए ज़्यादा कुछ दिख नहीं पाता था.
मैं ज़्यादा गौर से देख भी नहीं सकता था क्योंकि देखते हुए पकड़ा जाता तो मुश्किल हो जाती.
इसलिए डरता भी था, पर कई बार चूत की हल्की झलक मिल जाती थी.
कभी-कभी मैं आंगन के सामने वाले रूम में ही पढ़ता था, तो उस टाइम पढ़ते हुए तिरछी नज़र से देख लेता था.
भले ही मैंने उनकी चूत ना देखी हो, पर मम्मों को तो खूब देखा था
आज भी वे नहा कर बाथरूम से निकलती हैं तो सिर्फ़ साया पहन कर ही आती हैं.
अब तो उनके मम्मे पूरे ढीले हो चुके हैं और लटक कर पेट तक आ गए हैं.
मेरी मां भी जब भी नहाती थीं तो सिर्फ़ साया में ही.
पर जब मैं होता तो वह साया को अपने मम्मों के ऊपर बांध लेती थीं, जिससे पूरी तरह तो उनके चूचे नहीं दिखते, पर साया में कटा हुआ छेद से सब दिख जाता था.
पर जब मैं अचानक कहीं से आ जाता, तो उनके चूचों को देख लेता.
मेरी मां के चूचों का साइज़ 36 का था.
उनके निप्पल बड़े-बड़े और मोटे थे.
निप्पल के चारों तरफ़ काला गोला था, जो बहुत मस्त लगता था.
मैंने मां की चूत तो कभी नहीं देखी, पर मम्मे बहुत बार देखे हैं.
मुझे पता है कि मेरी मां भी बहुत चुदक्कड़ रही होगी, तभी तो मेरी बहन इतनी चुदक्कड़ हो गई है.
वह कहते हैं ना कि मां-बाप का गुण ही बच्चों में आ जाता है.
इसी तरह मेरे पापा भी मेरी तरह चुदक्कड़ रहे होंगे, इसलिए मैं ऐसा हूँ.
मेरी मां की उम्र अभी 45 साल की है, पर अभी भी उनके चूचे एकदम टाइट हैं क्योंकि जब वे नहा कर अपने नंगे मम्मे दिखाती हुई कमरे में जाती हैं न … तब उनके दूध एकदम मस्ती से थिरकते हैं और ऐसे दूध सिर्फ लौंडियों के ही देखे हैं मैंने ब्लू फिल्मों में.
मेरी मां चुदक्कड़ हैं, ये मुझे आज से कुछ समय पहले ही पता चला था.
हुआ यूं कि एक दिन मैं कोई चीज़ ढूँढ रहा था तो मैंने बेड का गद्दा उठा कर देखा.
क्योंकि हमारे घर में सबकी आदत है कि कोई भी छोटा सामान बेड के गद्दे के नीचे या उसके बॉक्स के अन्दर रख देते हैं.
इसलिए मैं बेड का गद्दा उठा कर कुछ कागज ढूँढ रहा था, तभी मुझे एक जापानी तेल की शीशी का पाउच मिला.
तभी से मैं समझ गया कि मेरी मां इस उम्र में भी कड़े लौड़े से चुदवाना चाहती हैं या वे पापा के लौड़े की जापानी तेल से मालिश करके उससे देर तक चुदने की जुगाड़ फिट करती होंगी.
मेरे पापा की उम्र अब 53 साल की हो गई है इसलिए अब तो उनका लंड ठीक से खड़ा भी नहीं होता होगा.
पर मां की आग को बुझाने के लिए उनको जापानी तेल यूज़ करना पड़ता होगा.
ये बात सोच कर ही मेरा लंड खड़ा हो गया था कि काश अगर किसी तरह मेरी मां मुझसे चोदने की बोल दें तो मैं उन्हें मस्त चोद दूंगा.
उन्हें चोद कर तो मैं जैसे जन्नत की हूर चोदने का सुख ले लूँगा.
मैं अपने दिमाग में प्लानिंग करने लगा कि किस तरह से मम्मी की चुदाई की जा सकती है.
मेरी मां घर का सारा काम करती थीं इसलिए कभी-कभी उनका बदन भी दुखता था.
तो वे मुझसे मालिश करवाती थीं.
पर अब जब मैं बड़ा हो गया तो वे मुझसे मालिश नहीं करवाती थीं लेकिन मुझे अपने चूचे दिखाने में परहेज नहीं करती थीं.
मम्मी ने अपनी मालिश के लिए अब एक मालिश वाली औरत रख ली थी.
वह औरत घर-घर जाकर औरतों की मालिश करती थी और बदले में पैसे या खाने का कुछ सामान लेती थी.
वह मालिश वाली औरत ज़्यादा सुंदर नहीं थी, बस एक साधारण सी औरत थी.
पर जब वह मालिश करने आती तो मां एक रूम में चली जातीं और अपने पूरे कपड़े उतार कर उस महिला से गर्म तेल लगवा कर पूरे जिस्म की मालिश करवाती थीं.
उस वक्त मैंने देखा था कि मम्मी कमरे का दरवाज़ा बंद नहीं करती थीं, वे सिर्फ़ पर्दा फैला देती थीं.
मैं जब भी दरवाज़े के पास या खिड़की के पास से गुज़रता तो मां के नंगे जिस्म को देख लेता.
ज़्यादा गौर से तो नहीं, पर थोड़ा बहुत देख लेता था.
मां के उभरे हुए चूतड़ और मम्मों को देख कर मेरा लंड सलामी देने लगता था.
मैं सोचता था कि काश इस मालिश वाली की जगह मैं होता तो मम्मी की चूचियों की मस्त मालिश करता.
उनके मम्मों को दबा-दबा कर उनका रस पी जाता और उनकी चूत को चाट-चाट कर उसका भी पूरा पानी पी लेता.
उसके बाद जब मम्मी गर्म हो जातीं, तो मैं अपने लंड से उनकी गांड और चूत का भोसड़ा बना देता.
यही सब सोच कर मैं उत्तेजित हो जाता और बाथरूम में जाकर मुठ मार आता था.
पर मेरी गांड फटती थी और उनके साथ कुछ करने की ना तो हिम्मत होती थी, ना मुझे मौका मिलता था.
धीरे-धीरे समय बीतता गया.
मेरी बहनें भी बड़ी हो गईं.
अब मां और दादी तो आंगन में नहा लेती थीं, पर बहनें कैसे नहाएं?
किसी तरह ज़िंदगी काट रही थीं.
मेरी बहनें अपने कपड़े पहन कर ही जल्दी-जल्दी नहा लेती थीं.
पर जब मैं नहीं होता तो वे भी आराम से नंगी होकर नहाती थीं.
अगर मैं अचानक आ जाता तो जल्दी से तौलिये में खुद को छुपा लेती थीं.
कुछ समय बाद जब मेरी बहनें फुल मस्त हो गईं, तो मां ने पापा को कहा कि अब बाथरूम बनाना ही पड़ेगा!
पर पापा के पास इतने पैसे नहीं थे कि वे बाथरूम बनवा सकें.
फिर कुछ सोचने के बाद एक आइडिया आया कि क्यों ना आंगन में ही एक गेट लगवा दिया जाए.
ये आइडिया सबको पसंद आया और कुछ दिनों में एक लोहे का गेट लग गया.
पर लोहे का गेट होने के कारण उसके क्लैंप और दीवार के बीच में काफी जगह थी, जिसमें से कोई आराम से देख सकता था.
खैर … समय ऐसे ही निकलता गया.
मैं जब भी आता तो गेट बंद होने पर उसके गैप से झांक कर देख लेता.
पर ज़्यादा देर रुक कर नहीं देख सकता था क्योंकि कोई मुझे भी देख सकता था.
इसलिए मैं भाग जाता था.
अब किचन उस तरफ होने के कारण सबको और प्रॉब्लम होने लगी.
अगर किसी को टॉयलेट जाना होता था या खाना बनाना होता था, तो बाहर ही रुकना पड़ता था.
इन बातों को देखते हुए कुछ समय बाद बाथरूम बनाने का निर्णय लिया गया.
किसी तरह मेरे पापा ने पैसे जुटाए.
पर आंगन में जगह ना होने के कारण एक छोटा सा ही बाथरूम बन पाया.
बाथरूम बन तो गया, पर छोटा होने के कारण कोई उसमें नहीं नहाना चाहता था.
फिर से वह दिन आ गया, जिसका मुझे इंतज़ार था.
जब मैं घर से कहीं बाहर गया होता, तब मेरी बड़ी बहन तो आंगन में ही नहाती थी.
एक दिन अचानक मैं बाहर से आ गया तो मैंने देखा कि मेरी बड़ी बहन सफ़ेद रंग की गंजी पहने हुए थी.
क्योंकि हम ज़्यादा अमीर नहीं हैं इसलिए मेरी बहनें ब्रा नहीं पहनती थीं.
मेरी मां मेरे पापा के पुराने पजामे में से काट कर उनके लिए गंजी सिल देती थीं.
मेरी बहन वही गंजी पहनी हुई थी, जो पानी से गीली होने के कारण उसके मम्मों से चिपक गई थी और मेरी बहन के दूध उसमें से साफ़ दिख रहे थे.
मैंने ध्यान से देखा तो उसके मम्मे पूरे गोले और कसे हुए लग रहे थे.
उस पर काले-काले निप्पल मानो अंगूर टंके हुए हों.
मैं तो देखता ही रह गया.
मुझे ऐसे देखते हुए मेरी बहन ने भी देख लिया.
कुछ पल के लिए जैसे समय रुक सा गया.
हम दोनों एक-दूसरे को देख रहे थे.
दोनों को पता नहीं चल रहा था कि क्या करें.
तभी मेरी बहन को जैसे होश आया.
वह जल्दी से बाथरूम में भागी.
बाथरूम में दरवाज़ा नहीं लगा था, सिर्फ़ पर्दा था … इसलिए उसमें भी कुछ-कुछ दिख जाता था.
जब कोई नहाने जाता तो पर्दे को बाल्टी से दबा कर रखता था, ताकि पर्दा हट न जाए.
मैं क्या बताऊं दोस्तो, पहली बार मैंने इतने अच्छे से किसी जवान लड़की के चूचों को देखा था.
मेरी तो जैसे हालत ही खराब हो गई थी.
उस समय मेरी बहन पूरी तरह नहीं नहाई थी, उसे अभी और नहाना था.
मैं ये सोच कर दिमाग़ चलाने लगा कि कैसे उसे और देखा जाए.
तभी मेरे अन्दर एक आइडिया आया.
मैं टॉयलेट का बहाना करके टॉयलेट में चला गया.
टॉयलेट और बाथरूम के बीच एक ही दीवार थी.
मैं अन्दर जाकर दीवार में कोई छेद ढूँढने लगा, जिससे कि मुझे कुछ दिख जाए.
पर मेरी बदकिस्मती, मुझे कोई छेद न मिला.
मेरा तो मन कर रहा था कि अभी दीवार फाड़ दूँ और बहन को पटक कर उसके चूचे चूस लूँ.
पर मुझमें इतनी हिम्मत कहां थी?
फिर मैंने सोचा कि क्यों ना इस दीवार में एक छेद बनाया जाए.
पर फिर मैंने सोचा कि अगर किसी ने देख लिया तो वह समझ जाएगा कि ये काम किसका है. क्योंकि घर में एक मैं ही हूँ जो ऐसा कर सकता हूँ.
फिर किसी तरह मैंने मुठ मार कर खुद को शांत किया और बाहर आ गया.
उसके बाद से मैं हर वक़्त अपनी बहन के चूचों को देखने के चक्कर में रहता था.
कभी-कभी थोड़ा मौका मिल जाता था.
जैसे जब वह झाड़ू लगाती थी या कोई काम करती थी तो मुझे उसके दूध दिखाई दे जाते थे … या जब वह बैठ कर बर्तन धोती थी तो उसके मम्मे नीचे से पूरे दब कर ऊपर उसके कुर्ते के गले से बाहर दिखने लगते थे.
मैं किसी बहाने से उसके सामने चला जाता था और चूचों को देख कर खुश हो जाता था.
एक-दो बार मेरी बहन ने मुझे ऐसे चक्कर काटते हुए देख भी लिया तो वह जल्दी से अपने कपड़े ठीक करने लगती थी.
मैं फिर नज़रें चुरा कर वहां से चला जाता था.
कुछ समय तक तो मैं कुछ कर नहीं पाया, पर अगर मौका मिलता तो मैं बहुत कुछ करने की इच्छा रखता था.
फिर उसके बाद मुझे बहनचोद बनने का अवसर मिला था, जिसे मैंने अपनी पिछली सेक्स कहानी में आपको लिख कर बताया था.
तो दोस्तो, ये थी मेरे घर की सच्ची सेक्स कहानी.
हालांकि सेक्स कहानी के इस भाग में मैंने चुदाई नहीं लिखी है लेकिन चुदाई हुई है और वह मैं आपको लिख कर जरूर सुनाऊंगा.
आशा है आपको मेरी यह सच्ची सेक्स कहानी पसंद आई होगी.
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