बहन की बुर की कहानी में जॉइंट फॅमिली में मेरी चचेरी बहन से मैं खुला हुआ था. मुझे सेक्स की समझ आई तो मेरी नजर अपनी उसी बहन की जवानी पर थी.
यह बात बहुत पहले की है, जब मैं अठारह-उन्नीस साल का था.
हम लोगों का बहुत बड़ा संयुक्त परिवार था और सब एक हवेलीनुमा घर में रहते थे.
हमारा परिवार खूब सम्पन्न था, नौकर नौकरानियां काम करते थे.
तीन चाचा थे, चार चाचियां थीं, मां-पिताजी थे और कुल मिलाकर हम सब चौदह भाई थे तथा दस बहनें थीं.
मुझसे बड़ी पांच बहनों की शादियां हो चुकी थीं और चार बड़े चचेरे भाइयों का भी ब्याह हो चुका था.
हमारी माताएं और भाभियां अपने-अपने कमरे में सोती थीं.
एक बड़ा सा ओसारा आंगन के चारों ओर था और हर तरफ पांच-छह चौकियां सटा कर रखी रहती थीं, जिन पर दरी-चादर बिछी रहती थी.
हम सभी भाई-बहन ओसारे पर साथ ही सोते थे
उस समय गांवों में पति-पत्नी के साथ सोने का रिवाज नहीं था.
पिताजी और चाचा लोग बाहर दालान में सोते थे, जो थोड़ी दूर पर था.
दालान और अंत:हवेली के बीच बड़ा सा खलिहान था जो हम लोगों के खेलकूद के काम आता था.
मेरी एक चचेरी बहन बेला थी जो मेरी ही उम्र की थी.
बचपन में हम साथ-साथ एक ही स्कूल में पढ़ते थे इसलिए हम दोनों एक-दूसरे से बहुत खुले हुए थे और आपस में हर तरह की बातचीत कर लेते थे.
वह मुझसे दो-ढाई महीने बड़ी थी इसीलिए मैं उसे बेला बहिन कहकर पुकारता था.
स्कूल की पढ़ाई के बाद बेला बहिन की पढ़ाई रुक गई क्योंकि गांव में हाई स्कूल से आगे की पढ़ाई का कुछ था ही नहीं और पहले लड़कियों का ज्यादा पढ़ना जरूरी भी नहीं समझा जाता था.
मैं अपनी आगे की पढ़ाई के लिए नजदीक के शहर में चला गया जहां मेरे पिताजी एक सरकारी ऑफिस में नौकरी करते थे.
छुट्टियां बिताने मैं गांव आ जाता था, जहां सभी भाई-बहन मिलकर खूब धमाल मचाते थे और बड़ा मजा आता था.
कुछ सालों बाद मैंने गौर किया कि बेला बहिन की संतरे जैसी चूचियां निकल आई थीं और वह सबकी नजर बचाकर उनको मसलती रहती थी.
बहन की बुर की कहानी तब बननी शुरू हुई जब एक दिन एकांत पाकर मैंने पूछ लिया- तुम अपनी चूची क्यों मसलती रहती हो?
वह बोली- मैं क्या करूं … बहुत सुबसुबाता सा रहता है.
मैंने पूछा- मैं मसल दूँ?
तो वह ‘धत्त’ कहती हुई शर्मा गई थी.
बेला मेरी बहन थी इसलिए मैंने इसके आगे कुछ सोचा ही नहीं.
चोदने-वोदने की बात तो दिमाग में थी ही नहीं.
धीरे-धीरे मैं इंटर में आ गया.
तब तक मेरे पांच-छह पक्के मित्र बन चुके थे.
सब आपस में चोदा-चोदी की बातें किया करते थे और चुदाई की कहानियों वाली किताबें भी पढ़ा करते थे.
उस समय मोबाइल, टीवी वगैरह तो था नहीं. उन किताबों को पढ़कर ही मजे ले लेते थे.
उन्हीं मित्रों से मैंने मुट्ठ मारना भी सीखा.
हम सब ग्रुप में ही चुदाई की कहानियां पढ़ते थे और पढ़ते-पढ़ते एक-दूसरे के सामने ही मुट्ठ भी मारने लगते थे.
अधिकतर हम लोग एक-दूसरे का टनटनाया हुआ लंड पकड़ कर एक-दूसरे की मुट्ठ मार देते थे और मजा ले लेते थे.
इसी बीच गर्मियों की छुट्टी में मैं गांव गया.
अब मैं जवान हो चुका था इसलिए किसी भी औरत या लड़की को देखता तो सोचता कि इसका छेद कैसा होगा.
चूचियां तो दिख जाती थीं क्योंकि तब मां या चाचियां जैसी महिलाएं अकसर ब्लाउज या ब्रा पहनना जरूरी नहीं समझती थीं और चूचियों को साड़ी के पल्लू से ही ढककर रखती थीं.
काम करते हुए उनका पल्लू खिसक जाता था तो चूचियां दिख जाती थीं.
लेकिन मैं तो सबका छेद देखना चाहता था और यह भी देखना चाहता था कि वे चुदवाती कैसे हैं.
एक बार एकांत में बेला बहिन से मैंने अपनी इच्छा जाहिर की और रिक्वेस्ट की- तू मुझे अपनी चुत दिखा दे!
मैंने उससे यह भी पूछा- लड़की की टांगों के बीच में चुत में कितने छेद होते हैं? क्या मूतने वाला और लौड़ा पेलने वाला छेद एक ही होता है? और कहां होता है?
बहिन फिर से ‘धत्त’ कहकर शर्मा गई और कोई जवाब न देकर सिर नीचा करके मुस्कुराने लगी.
उसी दिन दोपहर में मुझे मौका मिल गया.
जेठ की दुपहरी में कड़ी धूप होती है इसलिए बड़ों की हिदायत होती थी कि धूप में खेलने बाहर नहीं जाना चाहिए क्योंकि तब बीमार पड़ सकते थे.
इसीलिए दिन के भोजन के बाद सोना अनिवार्य कर दिया गया था.
हम सब सोने के लिए लेट गए थे.
थोड़ी देर बाद, जब लगा कि सब सो गए हैं, तो बेला बहिन … जो मेरे बगल वाली चौकी पर ही सोती थी, उसने मेरे कान में फुसफुसाकर कहा- चलो, अमरूद तोड़ने चलते हैं!
ऐसा कहकर वह चुपचाप उठी और चली गई.
मैं भी चुपचाप उठकर उसके पीछे गया.
थोड़ी ही दूरी पर मवेशियों के घर के पीछे एक अमरूद का पेड़ था जिसमें खूब मीठे और स्वादिष्ट फल लगते थे.
हम दोनों वहीं पहुंच गए, उधर बिल्कुल एकांत था.
बेला बहिन पेड़ पर चढ़ गई और अमरूद तोड़ने लगी. उसका एक पैर ऊपर की डाल पर था … और दूसरा पैर नीचे की डाल पर.
मैं नीचे ही खड़ा था. मुझे पेड़ पर चढ़ने में डर लगता था.
नीचे से मैंने देखा कि बेला बहिन की सलवार जांघों के बीच में फटी हुई थी और उसमें से उसका छेद साफ-साफ दिखाई पड़ रहा था.
बेला बहिन अमरूद तोड़ रही थी और मैं उसकी चुत का छेद देख रहा था.
टांगें फैली होने के कारण चुत के अन्दर का गुलाबी-गुलाबी हिस्सा भी दिख रहा था.
उसने आठ दस पके-पके अमरूद तोड़कर अपने दुपट्टे में बांध लिए और नीचे उतरने लगी.
तब उसकी चुत दिखाई देना बंद हो गई थी और मेरा ध्यान टूट गया था.
वह नीचे आई तो मैंने उससे कहा- तेरी सलवार फटी हुई है!
वह बोली- फटी नहीं है, मैंने जानबूझ कर वहां की सिलाई उधेड़ दी है. बाद में उसकी सिलाई कर दूँगी. तुम छेद देखना चाहते थे न … देख लिया?
मैंने कहा- मैंने छेद ठीक से देखा नहीं, केवल काली काली झांटें ही नजर आई थीं. तुम ठीक से दिखाओ न मुझे … मुझे चुत का छेद देखना है!
वह फिर से ‘धत्त’ बोलकर शर्मा गई और आगे बढ़ गई.
फिर वह बोली- तुम जो-जो देखना चाहते हो, सब दिखा दूँगी. इंतजार करो … दो-तीन दिन में मौका मिल जाएगा!
मैं बोला- अभी क्यों नहीं?
तो वह कुछ नहीं बोली और मुस्कुराती हुई आगे बढ़ गई.
उसकी चुत का गुलाबी-गुलाबी हिस्सा देखकर मेरा लौड़ा पूरी तरह टनटना कर खड़ा हो गया था.
मैं अपना तना हुआ लंड सहलाता हुआ उसके पीछे चल पड़ा.
कुछ देर बाद मेरा मुट्ठ मारने का बहुत मन करने लगा तो मैं बोला- मुझको पाखाना करना है, तुम आगे बढ़ो, मैं आता हूँ. फिर बैठकर अमरूद खाएंगे!
वह शायद समझ गई और हंसने लगी लेकिन कुछ बोली नहीं .. चली गई.
मैं थोड़ी दूर पर एक झाड़ी के पीछे छिप कर खड़ा हो गया और बेला बहिन के छेद को याद-यादकर और उसको चोदने की बात सोच-सोचकर मुट्ठ मारने लगा.
थोड़ी देर में जब मैं पूरी तरह से झड़ गया, तब मन थोड़ा शांत हुआ और मैं घर में आकर अपनी जगह पर लेट गया.
जल्दी ही वह दिन भी आ गया जब बेला बहिन ने अपना वादा पूरा किया.
एक दिन शाम को वह बोली- रात में जल्दी से खाकर सोने चले जाना, लेकिन सो मत जाना … मेरे संकेत की प्रतीक्षा करना!
सुनते ही मैं गर्म हो गया, यह सोचकर कि आज बेला बहिन मुझसे चुदवाएगी.
रात को नौ बजते-बजते हम सब भाई-बहन बिछावन पर चले गए.
लेकिन मेरी आंखों में नींद कहां थी, बेला बहिन की काली घनी झांटों वाली चूत का गुलाबी छेद ही बार-बार मेरी आंखों में नाच रहा था.
मां और चाची लोग अभी भी रसोई में व्यस्त थीं.
सब ब.च्चे सो गए तो बेला बहिन ने मुझे टहोका मारा.
मैं उठकर बैठ गया.
उसने चुपचाप पीछे आने का इशारा किया.
तुरंत ही वह अपनी मां के कमरे के सामने जाकर खड़ी हो गई.
मेरा कलेजा धक-धक करने लगा.
मैं उसके पास पहुंचा. वह मेरा हाथ पकड़ कर कमरे में घुस गई.
कमरे के भीतर घुप्प अंधेरा था.
मुझे कुछ दिखाई नहीं दे रहा था लेकिन जाना-पहचाना कमरा होने के कारण बेला बहिन आराम से भीतर चलने लगी और फिर दाहिनी ओर घूम गई.
मुझे याद आ गया कि उसकी मां के सोने वाले कमरे से सटा हुआ एक और बड़ा सा कमरा था, जो स्टोर के काम आता था.
वहां भी बिल्कुल अंधेरा था लेकिन बेला को पूरा अंदाज था.
हम दोनों धीरे-धीरे बिना किसी तरह की आवाज किए चल रहे थे.
उस कमरे में एक ओर दीवार से लगा हुआ एक बहुत कम ऊंचाई वाला बेंच था, जिस पर कपड़ों और अन्य तरह के सामानों से भरे हुए एक के ऊपर एक बहुत से ट्रंक रखे थे.
वह मुझे उन्हीं ट्रंकों के पीछे ले गई और हम दोनों वहीं बैठ गए.
मैंने सोचा कि अब चुदाई होगी.
इसलिए मैं अपना हाथ उसकी चूचियों पर फेरने लगा और सटकर उसे चूमना चाहा.
उसने मुझे बुरी तरह झटक दिया और फुसफुसा कर कहा- चुपचाप बैठो!
मैंने सोचा कि वह चाची के सो जाने के बाद चुदवाना चाहती है, इसलिए ऐसा कर रही है.
फिर भी मैं उसका हाथ पकड़े रहा और धीरे-धीरे उसका हाथ अपने तने हुए लंड पर ले गया.
उसने फिर से मुझे झटक दिया और गुस्से में फुसफुसा कर बोली- यदि ऐसा करोगे तो चली जाऊंगी … और फिर कुछ नहीं दिखाऊंगी!
उसका गुस्सा समझ कर मैं शांत बैठ गया.
जल्दी ही कमरे में रोशनी हुई.
चाची सोने आई थी.
वह लालटेन लेकर आई थी, उसी की रोशनी थी.
बेला फुसफुसा कर बोली- अब तुम्हारे मतलब का खेल देखने को मिलेगा!
चाची लालटेन लेकर स्टोर में आईं.
ट्रंक की ओट होने के कारण वे हम लोगों को नहीं देख रही थीं लेकिन हम लोग उन्हें साफ-साफ देख पा रहे थे.
चाची ने लालटेन एक ओर रख दी.
फिर वह अपनी साड़ी खोलकर पूरी नंगी हो गईं.
मुझे चाची की बड़ी-बड़ी चूचियां और काली झांटों से भरी हुई पावरोटी की तरह फूली हुई उनकी चुत का उभार साफ नजर आ रहा था.
चाची ने एक भीगे तौलिए से अपने पूरे शरीर को पौंछा और फिर चूचियों एवं छेद को भी रगड़-रगड़ कर पौंछा.
उसके बाद उन्होंने अपने पूरे शरीर पर टेल्कम पाउडर छिड़का, चूचियों और अपनी चुत पर भी.
फिर उन्होंने अपनी नौकरानी सबुजिया को बुलाया.
वह भीतर आई तो चाची को देखकर ठिठक गई और बोली- वाह मालकिन, ऐसे में तो आप गजब ढा रही हैं, मालिक देखेंगे तो आपको चोदने के पहले ही खलास हो जाएंगे!
चाची नकली गुस्से में बोलीं- चुप कर, ज्यादा बेशर्म होकर बात मत बना. मालिक पहली बार थोड़े ही देखेंगे. मुझसे पांच-पांच बच्चे पैदा कर चुके हैं!
सबुजिया फिर शरारत से बोली- एक बात तो है मालकिन. मालिक चुदाई जबरदस्त करते हैं. आपके ऊपर चढ़कर जब आपके छेद में लंड का धक्का देते हैं, तो लगता है ओखली में धमाधम मूसल चल रहा हो!
चाची बोलीं- लगता है तुम्हारा भी बहुत मन कर रहा है उनसे चुदवाने का. ठहरो, आज तुमको भी चुदवा ही दूँगी!
सबुजिया बोली- नहीं मालकिन, मालिक की चुदाई का मजा गांड उछाल-उछाल कर आप ही ले सकती हैं. वैसी चुदाई मैं तो नहीं झेल पाऊंगी. मेरा तो भुर्ता बन जाएगा. चुदवाने के लिए तो मेरा आदमी ही ठीक है. हौले-हौले प्यार से चोदता है.
इस पर चाची हंसती हुई बोलीं- तब तो तुम्हारे मर्द की ऐसी चुदाई से मेरा मन नहीं भरेगा. मेरी चुदाई के लिए तुम्हारे मालिक ही ठीक हैं!
इस पर दोनों खिलखिला कर हंस पड़ीं.
अब चाची ने एक पेटीकोट पहना और फिर एक धुली हुई साड़ी पहनती हुई बोलीं- बहुत गर्मी है. पंखा झलना शुरू करो, वर्ना पूरा शरीर पसीने से नहा जाएगा. मालिक को पसीने की बदबू पसंद नहीं है.
सबुजिया पंखा झलने लगी.
चाची धीरे-धीरे ब्रा, ब्लाउज आदि पहनती रहीं और बिंदी, नेलपॉलिश, आलता, जेवर आदि से सजती रहीं.
सबुजिया ने फिर मजाक किया- चुदवाने के पहले तो सब खोलना ही पड़ेगा, फिर क्यों इतनी मेहनत कर रही हैं?
चाची बोलीं- तो क्या हुआ? तुम अपने आदमी के पास जाती हो तो गांड चुत खोलकर नंगी ही चली जाती हो?
सबुजिया लंबी सांस भरती हुई बोली- हम लोगों का क्या है मालकिनी. जब भी आदमी को ताव चढ़ता है, पटक देता है और दोनों टांगें उठाकर हचाहच शुरू हो जाता है. आस-पास बच्चों का लिहाज भी नहीं करता है. सजने-संवरने का समय कहां देता है? लेकिन प्यार बहुत करता है. जब तक मैं नहीं झड़ती, वह चुदाई चालू रखता है. मेरे झड़ जाने पर ही दो-चार हुचके मारकर वह भी खलास हो जाता है!
चाची खिलखिला कर हंस पड़ीं और बोलीं- चुप बेशर्म … जा देख, मालिक आते ही होंगे. मुख्य दरवाजा खोल दे. मालिक भीतर आ जाएं तो फिर बंद कर देना.
सबुजिया खिलखिलाती हुई चली गई.
चाची भी एक बार आईना निहारने के बाद बिछावन पर चली गईं.
अब बेला ने फुसफुसा कर कहा- आओ हम लोगों को दोनों कमरे के बीच के दरवाजे के पास अंधेरे में बैठना होगा … चलो!
हम लोग बिना कोई आवाज किए धीरे-धीरे दरवाजे के पास आ गए, जहां से चाची के बिछावन का दृश्य साफ-साफ दिखाई पड़ रहा था.
चाचा के आने की आहट हुई तो चाची उठकर खड़ी हो गईं.
चाचा धीमे कदमों से भीतर आ गए.
तब सबुजिया ने दरवाजा बाहर से ही खींचकर उड़का दिया.
भीतर आकर चाचा ने दोनों हाथ बढ़ाए तो चाची उनके सीने को अपनी बांहों से कसती हुई लिपट गईं.
चाचा ने उनके चेहरे को ऊपर उठाया और वे दोनों एक-दूसरे को बार-बार चूमने लगे.
फिर दोनों एक-दूसरे के होंठों को चूसने लगे और एक-दूसरे के मुँह में जीभ डालकर प्यार करने लगे.
इसी स्थिति में खड़े-खड़े ही चाचा ने चाची के कपड़े खोलने शुरू किए.
पहले साड़ी का आंचल नीचे गिराया, ब्लाउज के बटन खोले और फिर ब्रा का हुक खोलकर शरीर से अलग कर दिया.
चाची की बड़ी-बड़ी चूचियां लालटेन की रोशनी में चमकने लगीं और चाचा उनको धीरे-धीरे दबाने लगे और चूची की टोटियों को धीरे-धीरे गुदगुदाने लगे.
फिर वे बोले- इस उम्र में भी आपकी चूची बहुत गठीली हैं, लगता ही नहीं है कि पांच-पांच बच्चों को आपने दूध पिलाया है!
फिर उन दोनों में चुम्मा-चाटी चलती रही और धीरे-धीरे साड़ी भी खुल गई, पेटीकोट भी उतर गया.
अब चाची बिल्कुल नंगी हो गईं.
उन्होंने चाचा को फिर उसी तरह कसकर जकड़ लिया.
चाचा ने उनको बिछावन पर बैठने का इशारा किया.
चाची बैठ गईं.
धीरे-धीरे उन्होंने चाचा की धोती खोल दी.
लगभग पचास वर्षीय चाचा का लौड़ा खूब लंबा, मोटा था और पूरी तरह टनटना कर खड़ा होकर फनफनाता हुआ बाहर आ गया.
मेरी पैंतालीस वर्षीय चाची ने लौड़े को एक हाथ में पकड़ा और दूसरे हाथ से सहलाती हुई बोलीं- इसी तगड़े लंड की मैं प्रतीक्षा कर रही थी, इसको याद-यादकर मैं तड़पती रहती हूँ. आज पूरे आठ दिन बाद देखने को मिला है!
चाचा बोले- अपना भी सुंदर सा, प्यारा सा छेद दिखाओ रानी, मैं भी अपनी रानी की चुत के छेद के लिए तड़पता रहता हूँ!
दोस्तो, आपको मेरी देसी बहन की बुर की कहानी में मजा आ रहा होगा.
प्लीज मुझे लिख कर जरूर बताएं.
अभी बहुत सारी चुदाई बाकी है.
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